Thursday, 17 December 2015

आँख का तारा - Aankh ka tara

आँख का तारा - Aankh ka tara, the Star


दसवीं कक्षा में पढ़ने वाला गौतम बहुत ही शांत स्वभाव का था । शरीर थोड़ा भारी होने की वजह से साथी बच्चे अक्सर उसे मोटू मोटू कहकर चिढ़ाते रहते थे परंतु गौतम कभी बुरा नहीं मानता था ।

साल भर पहले तक तो ठीक ठाक था, लेकिन पता नहीं क्यूं अचानक से उसका वजन बढ़ने लगा था । माँ कहती, मेरे लाल को खाया पिया गुण कर रहा है । तो पापा हंसकर कहते थे, "कुछ ज्यादा ही कर रहा है, आधा ही खिलाया पिलाया करो ।"

वैसे वो बेडौल नहीं दिखता था परंतु उम्र के लिहाज से कुछ अतिरिक्त वजनी ही था । उस वजह से वो ज्यादा भाग दौड़ वाले खेल भी नहीं खेल पाता और अक्सर इसी बात का उसके दोस्त मजाक उड़ाते रहते थे ।

"चल गौतम, सौ मीटर की दौड़ लगाएं ।" नीरव ने आ के उसे छेड़ा ।

"नहीं यार नीरव, तुझे दिख रहा है ना मेरा 50 किलो बोरे जैसा बदन । इसे लेकर क्या मैं भाग सकता हुं ।" गौतम ने हंस कर बात टाल दी ।

ये कोई पहली बार नहीं हुआ था । प्रायः कभी नीरव, कभी गोविन्द तो कभी युनुस आदि उसकी मजाक बनाते ही रहते थे । और गौतम सबको हंसकर जवाब दे देता था ।


आज मौसम का मिजाज कुछ आक्रामक था । आसमान से सूरज आग उगल रहा था । तापमान का मूड तो यूं लग रहा था जैसे धरती का सारा पानी सोख लेगा ।

ग्यारह बज रहे थे । टन टन टनन टनन..... छुट्टी की घंटी बजी । एक शोर के साथ विद्यार्थी भाग भाग कर बाहर आने लगे । कुछ ही देर में सभी अपने अपने घरों के रास्ते पर थे ।

नीरव और गौतम एक ही मुहल्ले में रहते थे इसलिए साथ ही आते जाते थे । स्कूल से उनके घर का रास्ता लगभग एक किलोमीटर का था ।

दोनों दोस्त भीषण गर्मी के बारे में ही बात करते हुए घर की तरफ जा रहे थे । बाकी बच्चे उनसे काफी दूर हो चुके थे । कुछ अलग अलग गलियों में गुम हो चुके थे ।

चलते चलते वे दोनों रेत के उस टीले तक आ चुके थे जो उनके स्कूल और घर के बीच में पड़ता था । अभी आधा रास्ता भी तय नहीं हुआ था और दोनों बुरी तरह थक चुके थे । पसीने से लथपथ ।

अचानक शायद गर्मी की वजह से पता नहीं नीरव को क्या हुआ, बस्ता हाथ से गिर गया और वो गिरने ही वाला था की गौतम ने उसे थाम लिया ।

"नीरव..... नीरव..." गौतम ने उसे आवाज लगाई, लेकिन वो शायद अपनी चेतना खो चूका था । गौतम ने मदद के लिए इधर उधर देखा, कोई दिखाई नहीं दिया । इस झुलसाती धुप में कौन घर से बाहर निकलता है । अन्य साथी भी काफी दूर जा चुके थे ।

एक बार तो वो घबरा ही गया, फिर पता नहीं कहां से उसमें इतनी ऊर्जा आ गयी कि झटपट नीरव को उसने अपने कन्धों पे उठाया । बस्तों को दूसरे हाथ में थामे दौड़ पड़ा घर की तरफ, जो अब ज्यादा दूर नहीं था ।

कुछ देर बाद बुरी तरह हांफता और पसीने से तरबतर वो नीरव के घर पहुँच गया । नीरव के माता पिता एक दफा घबरा से गए । फिर उन्होंने नीरव को कमरे में बिस्तर पर लिटाया, पंखा चलाया और उसकी मम्मी भी हाथ से पंखा करने लगी । गौतम को भी उन्होंने पंखे के नीचे बैठाया ।

नीरव के मुंह पर पानी के छींटे मारे तो थोड़ी देर में उसने आँखे खोली । तब तक दोनों के पसीने सुख चुके थे । नीरव की मम्मी भागकर पीने का पानी ले आई ।

नीरव के पापा ने उसे बैठाकर पानी पिलाया तो उसके चेहरे पर थोड़ी सी राहत आई । यही हाल गौतम का था । पानी बहुत स्वादिष्ट लग रहा था, प्यास के मारे । तब तक डॉक्टर साहब भी गौतम के पिता के साथ आ गए । नीरव की बहन ने उन दोनों को फ़ोन कर दिया था, संयोग से डॉक्टर साहब किसी को देखने मोहल्ले में ही आये हुए थे ।

डॉक्टर साहब ने नीरव और गौतम दोनों का मुआयना किया, और कहा, "चिंता वाली कोई बात नहीं है, गर्मी ज्यादा है इसलिए थोड़ी लू लग गयी । मैं दवाई लिख देता हुं, 2-3 दिन खानी है । शायद नीरव पानी कम पीता है । इसे कहें खूब पानी पीया करे ।"

फिर वो गौतम की और मुखातिब हो के बोले, "शाबाश गौतम, तुम्हारे जैसे दोस्त सबको मिल जाए तो वो दोस्त तो नसीब वाले होंगे । तुम भी ये दवा 2-3 दिन लेना । वैसे तुम बिलकुल ठीक हो और काफी मजबूत भी ।"

फिर हंसते हुए बोले "रोज थोड़ी कसरत करना चालु करदो कल सुबह से, क्या पता इस गर्मी में कब किसी और दोस्त को कंधे पर लाद कर भागना पड़े ।" फिर उसका कन्धा थपथपाते हुए वहां से निकल गए ।

नीरव के पापा ने गौतम को गले से लगाया और प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा । गौतम के पापा तो उसे गर्व भरी नजरों से निहार रहे थे । मानो कह रहे थे "सच में खाया पीया गुण कर गया।" नीरव, उसकी मम्मी और बहन की आँख में आंसू थे ।

अगले दिन नीरव तो स्कूल नहीं जा पाया लेकिन ये खबर वहां तक पहुँच चुकी थी । गोविन्द, युनुस और कक्षा के अन्य साथियों ने गौतम को अपने गले से लगा लिया ।

प्रार्थना के समय जब प्रधानाध्यापक जी ने गौतम को शाबाशी दी तो सब अध्यापकों व विद्यार्थियों ने तालियां बजाकर गौतम का सम्मान किया ।

आज मोटू सबकी आँखों का तारा बन गया था ।

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जय हिन्द

...शिव शर्मा की कलम से...



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