Wednesday, 2 December 2015

दोस्ती - Friendship, Friendship today and old days, Badalgayi Dosti

दोस्ती - Friendship


Friendship today and old days, Badalgayi Dosti.

"अरे मोहन, कल मेरे साथ जयपुर चलो ना । वहां कुछ अदालती काम है । तुम्हारी वहां जान पहचान भी है और जयपुर शहर के बारे में भी तुम काफी कुछ जानते हो । मुझे थोड़ी आसानी हो जायेगी ।" अशोक ने आग्रह भरे शब्दों में अपने दोस्त मोहन से निवेदन किया ।

मोहन अक्सर खाली ही रहता था । वो दलाली का काम करता था तो ज्यादातर उसका काम फ़ोन से ही हुआ करता था । खरीददार से आर्डर लेना और विक्रेता से उस माल को क्रेता के गोदाम तक पहुंचाने की व्यवस्था कर देना । उस सौदे की रकम का कुछ निर्धारित प्रतिशत प्रतिमाह उसे मिल जाता । अधिकतर विक्रेता जयपुर के थे इस वजह से मोहन की जयपुर में जान पहचान भी अच्छी थी ।

यही सब सोच कर अशोक ने मोहन से अपने साथ जयपुर चलने को कहा था । मोहन उसका दोस्त भी था, अब समय पर दोस्त के काम दोस्त नहीं आयेगा तो कौन आएगा ।

"क्यों नहीं यार, जरूर चलूँगा, और कल तो मैं वैसे भी खाली हुं, किसी कारण से बाजार बंद है, बोर होने से तो अच्छा है न गुलाबी नगरी की सैर की जाए, वह भी दूसरे के खर्चे पर, हाहाहाहा ।" मोहन ने जवाब दिया । "मजाक कर रहा हुं यार, लेकिन हां,  खाने में घी से तर दाल बाटी खाऊंगा, सोच ले ।"

"खा लेना यार, दाल बाटी तेरे से ज्यादा थोड़ी ही है ।" और अगले दिन सुबह की बस से जयपुर जाने का तय करके दोनों अपने अपने घर के लिए चल पड़े ।

करीब दो घंटे बाद मोहन का अशोक के फ़ोन पर फ़ोन आया और उसने कहा की "कल मैं तुम्हारे साथ नहीं जा पाऊंगा । तेल मिल वाले सेठजी के लड़के ने बुलाया है । तुम जानते हो ना विकाश को, जो मेरा दोस्त भी है । ये तो पता नहीं क्यों बुलाया है, पर माफ़ करना यार अशोक, हो सकता है वो कुछ फायदे वाला सौदा करवा देवे ।"

"कोई बात नहीं मोहन, काम पहले" कहकर अशोक ने फ़ोन काट दिया ।

उपरोक्त भूमिका मैंने सिर्फ ये बताने के लिए बनायी है की आजकल दोस्ती, और रिश्तेदारीयां भी,  सब इसी बिनाह पर मजबूती पाती है कि किससे कितना "फायदा" हो सकता है ।

क्षमा कीजियेगा परंतु दोस्ती के मायने बदल गए हैं । कुछेक अपवाद हो सकते हैं मगर आज के समय में वो दोस्त नहीं रहे जो अपने दोस्तों के लिए प्राण तक न्योछावर करने को तैयार रहा करते थे ।

कोई अगर मुश्किलों के दौर से गुजर रहा होता, और उसका कोई दोस्त कहता "चिंता मत कर, मैं हुं ना, सब ठीक हो जायेगा ।" इस तरह के दृश्य अब लगभग अदृश्य हो चुके हैं ।

दुर्भाग्य की बात है कि आज के दौर में तो दोस्त और दोस्ती महज "इस्तेमाल की चीज" बन कर रह गयी है । जब तक कोई काम का है तब तक दोस्त है वर्ना नमस्ते ।

इससे भी बड़े दुःख की बात ये है कि अगर कोई दोस्त तरक्की कर रहा होता है, तो अन्य दोस्त ये कोशिश करते हैं कि कैसे इसकी टांग खिंच के निचे गिराएं । ये हमसे आगे कैसे निकल रहा है ।

इसके अलावा ये भी विडम्बना है की कई दोस्त तो ये मौका तलाशते हैं कि किस दोस्त को सीढ़ी बनाकर कैसे आगे बढ़ा जाए ।

मैं ये नहीं कह रहा हुं कि सभी दोस्त इस तरह के होते हैं, लेकिन ये भी कड़वा सच है कि वर्तमान युग में अधिकतर इसी श्रेणी में आते हैं ।

अफसोस की बात है कि बदलते वक्त के साथ दोस्ती के चेहरे में भी बदलाव दिखाई दे रहे हैं । शोले फ़िल्म के जय और वीरू जैसी दोस्ती तो विरला ही देखने को मिलती है ।







युं तो कहने को हमारे बहुत से दोस्त होते हैं मगर सच्चा दोस्त किसी बहुत ही खुशनसीब को मिल पाता है । वैसे आज भी दोस्ती कि मिसाल पेश करने वाली ख़बरें जब समाचार पत्रों में पढ़ते हैं या टीवी पर देखते हैं तो लगता है की दोस्ती अब भी कहीं ना कहीं जिन्दा है ।

एक अच्छा दोस्त जीवन में हो तो जीवन की आधी परेशानियां तो युं ही हल हो सकती है । कोई भी बात जो आप किसी से नहीं कर सकते वो एक दोस्त के साथ की जा सकती है । कभी अगर हम परेशानियों में घिरे हों और सब कोई हमारा साथ छोड़ दे, तो एक दोस्त ही होता है जो हमें हौसला देता है, मुश्किलों से डटकर सामना करने का ।



इसलिए दोस्तों, दोस्ती के इस अटूट रिश्ते के महत्त्व को समझिये और कोशिश कीजिये, दोस्ती की एक महानतम मिसाल कायम करने की ।

हमेशा की तरह आज भी एक शेर याद आ रहा है ।

"शर्ते लगायी नहीं जाती दोस्ती के साथ,
कीजे मुझे कबूल मेरी हर कमी के साथ"

कल फिर मिलेंगे दोस्तों । तब तक आप कुछ और दोस्त बनाइये ।

Click here to read " बचपन - Childhood" by Sri Shiv Sharma


जय हिन्द

...शिव शर्मा की कलम से...







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