Monday, 11 January 2016

Woh Kagaj Ki Kashti - वो कागज़ की कश्ती

वो कागज़ की कश्ती - Woh Kagaj Ki Kashti

शाम का समय, गली में कुछ बच्चे गाँव के परम्परागत खेल खेलने में मशगूल थे, दीन दुनिया से बेखबर, अपनी दुनिया में मस्त । कभी किसी बात पर तकरार भी करते मगर अगले ही पल फिर वैसे के वैसे ।

मैं घर की छत पे खड़ा टेपरिकॉर्डर पे संगीत सुन रहा था और साथ ही उनकी बाल क्रीड़ाओं का आनंद भी ले रहा था । एक तरह से उनको देख कर फिर एक बार अपना बचपन जीने की कोशिश कर रहा था ।

उनको देख कर मुझे भी मेरा बचपन याद आने लगा । मुझे याद है स्कूल से आते आते रास्ते में ही प्लान बन जाया करते थे । मदन कहता आज जाते ही कलेवा (नाश्ता) करके सब पीछे वाली स्कूल के मैदान में आ जाना । क्रिकेट खेलेंगे । राजू तुम बैट और स्टम्प ले आना, गेंद मेरे पास है । कल ही दो रुपये में नई लाया था ।




और वही हुआ करता था । स्कूल से आके झटपट कुछ खा के मैदान में जाने की जल्दी रहती थी । माँ, दीदी थोड़ी ना नुकर के बाद वापस जल्दी आना की हिदायत के साथ खेलने जाने की इजाजत दे दिया करती ।

उसके बाद मैदान में आधे आधे बच्चों की दो टीम बन जाती और शुरू हो जाता एक ऐतिहासिक मैच । हां, बच्चे संख्या में कम होने की वजह से फील्डिंग सबको करनी पड़ती थी । जिसमे अपनी टीम के खिलाड़ी के कैच अक्सर छूट जाया करते थे । विरोधी टीम तोहमतें लगाती रहती की तुमने जान बूझकर इतना आसान कैच छोड़ दिया मगर ये दोनों तरफ से होता था इसलिए तिल का ताड़ नहीं बना करता था ।

रन संख्या जोड़ने में भी बदमाशियां करते थे, 15-20 रन हो जाते तो शक होने पर सामने वाली टीम का कप्तान एक एक रन का हिसाब लेता, और हम उसे बाकायदा गिना देते एक एक रन, जबकि दो तीन रन उनमें फ़ालतू के जुड़े हुए होते थे । उस वक्त मैदान में जो चौके छक्के लगते थे उनका आनंद ही अलग हुआ करता था ।

मौसम के अनुसार हमारे खेल भी बदल जाया करते थे । गर्मियों के मौसम में इंडोर गेम्स लूडो, सांपसीढ़ी, केरम इत्यादि खेल बहुतायत में होते थे ।

पतंगों के मौसम में पतंग उड़ाना अच्छा लगता था, लेकिन उससे ज्यादा मजा पतंगें लूटने में आया करता था । कोई कटी हुई पतंग अगर अपनी ही छत पे आ गिरती तो लगता जैसे कुबेर का खजाना हाथ लग गया हो ।

भैया पतंग उड़ाते और मांझे की चरखी हमें थमा देते थे । फिर जब वे कोई पतंग काट देते तो उसका श्रेय हम भी लेने की कोशिश करते, "मैंने चरखी ठीक से पकड़ रखी थी ना भैया, कस के नहीं पकड़ी इसलिए ढील देने मेँ आपको आसानी रही और हमने वो पतंग काट दी।" भैया भी मुस्कुरा कर पीठ थपथपा दिया करते थे ।


अगले दिन स्कूल जाते आते समय विषय भी वही हुआ करता था । "कल मेरे भैया ने पांच पतंग काटी, मेरे भैया बरेली वाला मांझा लाये थे, बहुत पक्का मांझा है, आसानी से तो हाथ से भी नहीं टूटता, किसी और मांझे से काटना तो दूर ।"

आकाश में उड़ते हवाई जहाज को दूर तक जाते हुए देखा करते थे । मोहल्ले में कोई तांगा या ऊँट गाड़ी आती तो उन चाचा से थोड़ी दूर सैर करवाने की गुजारिश किया करते थे । कभी कभी कोई चाचा "दयावान" निकल जाया करते थे और हम सैर का आनद उठा लेते थे । वैसे अक्सर झिड़कियां ही मिलती थी ।


बनती हुई सड़क का निर्माण कार्य देखना भी मन को भाता था । पहले बड़े बड़े पत्थर फिर उसके ऊपर छोटी कंक्रीट और फिर बड़ा सा रोड रोलर आता था, जो आगे पीछे घुमा घुमा के सड़क को सपाट करता । फिर उस सड़क पर पिघला हुआ डामर कितने करीने से डाला जाता था और सड़क तैयार हो जाया करती । हम घंटों उन मजदूरों को काम करते हुए देखते रहते थे ।

गांव में रामलीला मंडली आती थी तो एक त्योंहार का सा माहौल हो जाया करता था । सबके साथ रामलीला देखने जाया करते थे और मंच पर प्रदर्शन करने वाले उन कलाकारों में राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान देखा करते थे ।

"भैया आ जाओ, खाना खा लो" छोटी बहन की आवाज आई तो मैं यादों के भंवर से बाहर आया । टेपरिकॉर्डर में मशहूर मधुर गायक जगजीत सिंह जी का गाया गीत बज रहा था ।

"ना दुनिया का गम था, न रिश्तों के बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी,
वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी"




सच में कितना सुहाना होता है बचपन । जीवन का ये ही हिस्सा शायद सबसे खूबसूरत होता है । उड़ते पंछी के लिए खुले आसमान की तरह स्वच्छंदता से उड़ान भरने की आजादी ।

बड़े होने के बाद दिल करता है एक बार फिर से बच्चे बन जायें । माँ से लोरियां सुनें, पिताजी के साथ उनकी ऊँगली पकड़ कर बाजार जायें । भैया से जिद्द करें साईकिल पर बैठा के घुमाने की । कागज की नाव बना कर पानी में चलायें ।

लेकिन समय को कौन पकड़ पाया है, ये तो चलता रहता है, और अपने साथ ले जाता है किसी का बचपन, किसी की जवानी और ढकेल देता है बुढ़ापे की तरफ जिसके बाद जीवन में और कोई अवस्था नहीं आती । ये ही संसार का, प्रकृति का नियम है । जीवन का पहिया है, चलता ही रहता है ।

अभी इजाजत चाहूंगा दोस्तों । फिर मिलने के वादे के साथ ।

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जय हिन्द

....शिव शर्मा की कलम से....


4 comments:

  1. Bahut khub, It's really the same story of everyone's childhood life ...........

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