Saturday, 14 May 2016

Naseeb Apna Apna-Part II - नसीब अपना अपना (भाग-2)

NASEEB APNA APNA (PART - 2) - नसीब अपना अपना (भाग-2)


कल आपने पढ़ा कि रूपेश को बड़े लाड़ प्यार से खुद कष्ट सहकर भी सुनीता ने पाल पोसकर बड़ा किया, उसे अच्छी शिक्षा दिलवाई, सूंदर सी लड़की से उसकी शादी करवाई और जब सुनीता के आराम करने के दिन आये तो अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी । क्या हुआ था ऐसा, जानने के लिए पढ़िए "नसीब अपना अपना (भाग-2) ।" ..........

..... लेकिन फिर वो हुआ जिसकी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी, विशेषतया सुनीता ने तो ऐसा सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ऐसा भी हो सकता है ।

पिछले कुछ दिनों से बहु कुछ चिड़चिड़ी सी हो गयी थी, रूपेश भी माँ को लगभग अनदेखा करने लग गया था ।

दरअसल बहु रूपेश के कान भरने लग गई थी और माँ के साथ नहीं रहने की जिद्द करने लग गई थी । जबकि सुनीता उसे बहु नहीं, बेटी की तरह रखती थी । हां कई जगह वो उसे उसके ही भले के लिए टोकती भी थी यदि बहु कहीं गलत होती थी ।


बहु को ये सब अपनी आजादी में बाधा लगती थी और वो नमक मिर्च लगाकर रूपेश को कुछ इस तरह जताती जैसे उसकी माँ उसे बहुत परेशान कर रही थी ।

कहते हैं ना कि एक झूठ को यदि सौ बार बोला जाए तो वो सच प्रतीत होने लगता है । इसी तरह रुपेश भी शायद उसकी बातों में आ गया था तभी तो उसने एक दिन माँ से कहा,

" माँ, कुछ कारणों से तुम्हारी बहु अलग रहना चाहती है, क्योंकि तुम्हारे यहाँ होने से वो अपने आप को कुछ बंधा हुआ सा महसूस करती है, अतः मैंने ये तय किया है कि तुम्हे एक कमरा किराये पर ले के दे देता हूँ, घर पर महीने का राशन और हर महीने कुछ रुपये मैं तुम्हें देता रहूँगा, मेरा मन तो नहीं मान रहा पर माँ, पर तुम्हे मेरी और अपनी बहु की खातिर इतना तो करना पड़ेगा । फिर कुछ ही दिनों में मैं तुम्हारी बहु को समझा बुझा कर मना लूंगा और तुम्हे वापस ले आऊंगा ।"

सुनीता को तो जैसे सांप सूंघ गया, वो अविश्वसनीय नजरों से रूपेश का मुंह देखने लगी । उसको बिलकुल भी यकीन नहीं हो रहा था कि रूपेश, उसका रूपेश, ये बात कह रहा है ।

भीगी आँखों से लगभग याचना भरी निगाहों से अपने बेटे की तरफ देखते हुए उसने थोडा विरोध और फिर मिन्नतें भी की थी कि वो घर के ही किसी कोने में चुपचाप पड़ी रहेगी, परंतु बहु ने स्पष्ट कह दिया की यहाँ या तो आप रहोगी या मैं ।


अब सदियों से यही तो होता आया है कि बच्चों की खातिर माँ बाप हमेशा समझोता करते आये हैं, सुनीता ने भी किया और वो उन दोनों को स्वतन्त्र छोड़ कर अलग रहने के लिए बेटे के साथ चल पड़ी । परंतु ये क्या.......! बेटा तो उसे वृद्धाश्रम में ले के आया था ।

"माँ बस कुछ दिन, मैं तुम्हारे लिए एक अच्छे घर की तलाश करता हूँ तब तक आप यहाँ रहो । फिर में आपको यहाँ से ले जाऊंगा ।"

"और रूपेश वहां से ऐसे भागा था जैसे उसे डर हो कि कहीं मैं उसके साथ वापस ना चल पडूँ । आज 12 महीने हो गए हैं, ना बेटा आया ना बहु और ना ही उनका कोई फ़ोन ।" कहते कहते सुनीता का गला रुन्धने लग गया । उसके आसपास बैठी अन्य महिलाओं की आँखें भी नम थी क्योंकि उन सबकी भी लगभग यही कहानी थी ।

"जिस बेटे को इतने लाड प्यार और कठिनाइयों से पाला वो ऐसा करेगा, कभी सोचा नहीं था । लेकिन मैं जानती हूँ वो आएगा, और मुझे यहाँ से ले के जाएगा" सुनीता ने आरामदायक कुर्सी पर सर टिकाकर आँखें मूंद ली । अगले कुछ पलों तक कमरे में ख़ामोशी छाई रही ।

फिर एक अन्य औरत ने सहानुभूति से सुनीता के कंधे पर हाथ रखा और कहा "ये ही दुनिया है सुनीता बहन, अपने अपने नसीब है। अब तो हमें यहीं जीना है और यहीं मर जाना है, हम मरेंगे तब हो सकता है हमें हमारा बेटा लेने आ जाये, अगर उसमे अपनी माँ के प्रति थोडा सा भी सम्मान बाकी है तो ।"

वो औरत थोड़ी क्रोधित हो चुकी थी और बोलती ही चली गई ।


"और मैं तो चाहती हुं कि वो अपनी पत्नी को भी यहां अपने साथ ले के आये और उसे बताये कि भविष्य में कहीं उसका बेटा भी उसके साथ यही बर्ताव करे तो उसे कैसा महसूस होगा, भगवान ना करे ऐसा हो परंतु कहावत है ना कि करंता सो भोगन्ता । जो जैसा करता है उसे वैसा भोगना भी पड़ सकता है । सही कह रही हुं ना सुनीता बहन ?"

सुनीता को कोई जवाब देते ना देख उस महिला ने उसे सुनीता बहन..... सुनीता बहन..... आवाज देकर थोड़ा हिलाया तो सुनीता की गर्दन एक तरफ लुढक गयी । उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे ।

"अब शायद इसका बेटा इसे लेने आएगा" पीछे से किसी महिला की रुंधी हुई सी धीमी सी आवाज आई । वहां मौजूद सभी महिलाओं की आँखें झर झर बहने लगी थी ।

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****शिव शर्मा की कलम से****









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