Thursday, 12 May 2016

Naseeb Apna Apna (Part - 1) - नसीब अपना अपना (भाग-1)





NASEEB APNA APNA (PART - 1) - नसीब अपना अपना (भाग-1)



"चलो बिट्टू, खाना खाने का वक्त हो गया, खाना खाओ ।" माँ ने प्यार से अपने 7 वर्षीय लाल रूपेश, जो कि उस वक्त सो रहा था, के सिर पर हाथ घुमाते हुए कहा । रूपेश ने बालसुलभ चंचलता वाले अंदाज में उहुँ कहते हुए ना में गर्दन हिलाई और करवट बदल के सोने की चेष्टा करने लगा ।

माँ ने फिर उसके माथे को चूमते हुए गुदगुदी की तो वो खिलखिलाकर हंस पड़ा लेकिन उठा नहीं और बोला "ममा मुझे भूख नहीं है, मुझे और सोना है ।"

"ठीक है, 5 मिनट और सो जाओ, फिर हम खाना खाएंगे, ठीक है ना" माँ ने जैसे उसकी बात रखने के लिए हार मान ली ताकि वो उठ के ख़ुशी ख़ुशी खाना खा लेवे । और 5 मिनट की बजाय आधे घंटे बाद माँ ने उसे उठाया । फिर खूब मिन्नतें कर कर के उसे खाना खिलाया, उसकी स्कूल का होमवर्क करवाया ।

साथ ही साथ अपना सिलाई का काम भी कर रही थी । ये उसका लगभग रोज का काम था । रूपेश काफी चंचल था । दो वर्ष पहले एक दुर्घटना में रूपेश के पिता की असमय मृत्यु हो गई थी ।




उनकी बीमा के कुछ पैसे मिले थे जो पर्याप्त तो नहीं थे मगर उन पैसों की मदद से रूपेश की स्कूल फीस भरने के बाद भी कुछ पैसे बचे उस से उसकी माँ एक सिलाई मशीन ले आई थी।

वो महिलाओं के कपड़ों की सिलाई का काम जानती थी और सिलाई का काम भी काफी सफाई से करती थी जिस वजह से कुछ ही दिनों में मोहल्ले की लगभग सभी औरतें और बहुत सी लड़कियां उस से कपडे सिलवाने लगे थे । जिसकी आमदनी से वो अपना घर खर्च और रूपेश की शिक्षा का खर्च बड़ी आसानी से उठा लेती थी ।

समय गुजरता गया । रूपेश भी समयानुसार बड़ा होता गया, पढ़ाई में होशियार था । पढाई के लिए जो भी खर्च होता था उसकी माँ सुनीता कैसे भी जोड़ तोड़ करके व्यवस्था कर दिया करती थी । यहाँ तक कि तब उसने अपना घर भी गिरवी रख दिया था जब रूपेश को बड़ी कॉलेज में दाखिला करवाना था । पढाई महँगी थी पर सुनीता ने रूपेश के भविष्य के लिए कष्ट सहकर भी उसका दाखिला करवाया था ।

अंतिम वर्ष की परीक्षाओं से पहले कॉलेज में कुछ कंपनियों के प्रतिनिधि अपनी कंपनी में कर्मचारियों की भर्ती हेतु विद्यार्थियों का साक्षात्कार लेने आये थे और सौभाग्य से एक अच्छी कंपनी में रूपेश का अच्छे पद पर चयन भी हो गया था ।

उस दिन ख़ुशी ख़ुशी रूपेश ने माँ को जब ये सब बताया तो वो तो ख़ुशी के मारे पागल ही हो गई । उस दिन घर में पकवान बने थे ।

अंतिम वर्ष की परीक्षा का परिणाम भी रूपेश के पिछले परिणामों की तरह अत्यंत सुखद था ।


वो प्रथम श्रेणी में पास हुआ था । माँ के गले से लगकर ख़ुशी से रो पड़ा था और कहा, "माँ अब तुम्हे काम करने की आवश्यकता नहीं रहेगी । मैं कमाऊँगा, तुम आराम करो।"

माँ ने कहा "आराम तो बहु आने के बाद होगा बेटा, अब तू विवाह के योग्य हो गया है, अब मैं तो जल्दी से जल्दी बहु लाऊंगी" ।

"तुम भी माँ, अभी मेरी उम्र ही क्या हुई है" रूपेश ने दिखावटी लज्जा दिखाते हुए कहा और बाहर निकल गया । माँ भी मुस्कुरा उठी ।

समय बीतते समय नहीं लगता । पदोन्नति पा पा कर रूपेश काफी ऊँचे पद पर आ चूका था । अब वो बड़ा अफसर बन चूका था । कर्ज चुकाकर वो अपना घर भी मुक्त करवा चूका था जो माँ ने उसके ही नाम करवा दिया था ।

कुछ समय पश्चात् रुपेश का विवाह एक सूंदर सी लड़की के साथ हो गया । उसके और कोई रिश्तेदार तो थे नहीं । दादा दादी और नाना नानी भी बहुत पहले स्वर्ग सिधार चुके थे ।

किसी दूर के रिश्तेदार ने ये रिश्ता करवाया था । सुनीता को देख कर तो ऐसा लगता था जैसे उसने अपने जीवन की अनमोल चीज पा ली थी ।

रूपेश के मना करते करते भी वो बहु के कामों में हाथ बंटाया करती थी । रूपेश कुछ कहता तो वो हंसकर कहती कि अगर काम नहीं करुँगी तो शरीर में चर्बी बढ़ने लग जायेगी और मोटी हो जाउंगी, सो थोडा बहुत काम कर लेती हूँ । वैसे सारा काम बहु ही तो करती है ।

रूपेश की शादी के बाद हंसी ख़ुशी पांच साल गुजर गये, हालाँकि कई बार सुनीता ने महसूस किया था कि बहु कुछ अनमनी सी है । सुनीता सोचती थी कि शायद अभी तक आँगन में नन्ही किलकारी नहीं गूंजी थी इस वजह से शायद बहु उदास होगी ।

मगर बात कुछ और ही थी बहु के मन में । हुआ युं था कि सुनीता की बहु कुछ ज्यादा ही किटी पार्टी में आती जाती थी और सुनीता ने एक दिन उसे मना कर दिया था । हालाँकि सुनीता ने उसे बहुत ही मधुर शब्दों में समझाने वाले तरीके से समझाया था और इस बात को भूल भी गयी थी ।  लेकिन बहु के दिलो दिमाग में कुछ और ही चल रहा था ।

फिर वो हुआ जिसकी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी, कम से कम सुनीता ने । .................

....... क्षमा चाहूँगा मित्रों । कहानी कुछ लंबी हो रही है, सो इसे आप संयोग की तरह 2 भागों में पढ़ें । दूसरा भाग कल आपके लिए उपलब्ध हो जायेगा जिसमें आपको पता चलेगा कि ऐसा अचानक क्या हुआ था जो अकल्पनीय था । बहु ने या सुनीता ने क्या कुछ कहासुनी की या कुछ और हुआ । जानने के लिए कल इसी कहानी का दूसरा भाग जरूर पढ़ें । अपनी कीमती राय अवश्य देना ।

जय हिन्द

****शिव शर्मा की कलम से****


Click here to read "मां, एक पूरी दुनिया" written by Sri Shiv Sharma










Note : We do not own the Images and Video published in this blog, it belongs to its rightful owners. If objection arises, the same will be removed.



1 comment:

  1. Wah Sharmaji, Bahut Din baad aap ke blog, woh bhi suspense de diya!!

    ReplyDelete