Friday, 8 September 2017

Mobile - मोबाईल

मोबाईल


नमस्कार मित्रों । आज बात करते हैं मानव जीवन की दीनचर्या में अपना एक अहम् स्थान बना चुके मोबाइल फ़ोन की, जिसके आने से वाकई दुनिया सिमट कर मुट्ठी में आ चुकी है । चौबीसों घंटे आप अपने परिजनों की पहुँच में रहते हैं ।

आपने भी अवश्य ही गौर किया होगा कि मोबाइल आजकल किसी नामी गिरामी हस्ती से भी बड़ा स्टार बन चूका है, साथ ही मानव जीवन में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान भी बना चुका है । हालात ये हो गए हैं कि आजकल घर में जितने सदस्य हैं उतने ही, या उससे ज्यादा भी, मोबाइल फ़ोन है ।

और तकनीक का तो कहना ही क्या, रोज कुछ ना कुछ नया अनोखा गुण लिए तरह तरह के चमचमाते फोन बाजार में आ भी रहे हैं और धड़ाधड़ बिक भी रहे हैं ।

कल तक जो मोबाइल किसी के लिए दुनिया का सर्वश्रेष्ठ नग हुआ करता था वो नए अतिरिक्त गुणों वाले मोबाइल के बाजार में आते ही पुराना और बेकार लगने लग जाता है, और वो उस मोबाइल के साथ बिताए सारे हसीन लम्हों को पल भर में भुला कर नए अवतरित हुए फ़ोन से नाता जोड़ लेता है ।

लोगों के इस शौक की वजह से ये दृश्य अब घर घर में आम हो गया है कि घर में अलमारी की एक आध दराज तो दो चार पुराने फोन, कुछ बैटरियां, हैडफ़ोन, चार्जर, मोबाइल कवर इत्यादि से भरी रहती है ।




तरह तरह की सुविधाओं वाले इन मोबाइल फोन में एक और सुविधा भी है । गेम्स की । जो गेम कभी गलियों या मैदानों में खेले जाते थे वे भी आजकल इस छोटे से जादुई डब्बे में आ गए ।

लेकिन ये तो मानना पड़ेगा कि जो आनंद उन खेलों का गली मैदान में आता था वो इस डब्बे में कहां । जब दोस्तों के साथ दो चार दिन पूर्व ही योजना बनाकर छुपा छुपी जो "तीन पत्ती" खेलने का मजा था, वो थोड़े ही मिल पाता है मोबाइल में ।

वैसे तो इन गेम्स ने दुनिया में मम्मियों को (कहीं कहीं बीवियों को भी) बड़ा तंग कर रखा है । कई कई बार तो तब बेचारी परेशान हो जाती है जब गेम में डूबा उसका लाल खाने पर भी तवज्जो नहीं देता है ।

खाना पड़े पड़े ठंडा हो जाता है लेकिन वो वीर खिलाड़ी लेवल पार करने की कोशिश में जी जान से लगा रहता है । भले ही इस चक्कर में मम्मी की डांट और कभी कभार पापा से फटके भी पड़ जाए ।

उसके बाद दो चार दिन तो स्तिथि नियंत्रण में रहती है, इस बीच फिर कोई छुट्टी का दिन या रविवार आ जाता है और मम्मी का मूड देखकर "मम्मी थोड़ी देर खेल लुं" का बिल पास करवा कर वो फिर अगले लेवल को पार करने की जद्दोजहद शुरू कर देता है ।




ये तो है वास्तविक स्तिथि । अब यही दृश्य बदल जायेगा यदि ऐसा हो जाये कि गेम खेलने के हर पॉइंट या हर लेवल पर कुछ लाल नीले नोट मिलने लग जाये । फिर तो जो दृश्य होगा उसकी कल्पना करके ही आनंद आ रहा है ।

बेटा मोबाइल स्क्रीन पर नजरें जमाये तेजी से उंगलियां चला रहा है जिसमें टोपी पहने एक लड़का रेल पटरियों पर कूदते फांदते भागे जा रहा है और इधर पॉइंट्स बढ़ते जा रहे हैं । पापा पास की स्टूल पर बैठे बीच बीच में "शाबाश, वेरी गुड, वाओ क्या जम्प लगाई" जैसे शब्दों से बेटे का हौसला बढ़ा रहे हैं ।

उधर मम्मी रसोई में अपने "कमाऊ लाल" के लिए केसर बादाम वाला दूध तैयार कर रही है । गेम पूरा होने पर पापा मम्मी दोनों बेटे को गेम की टास्क पूरा करने पर बधाइयां दे रहे है । पापा अपने दोस्तों को फोन करके गर्व से बेटे के गेम के पॉइंट्स बता रहे हैं ।

शाम को अपने हाथों से खाना खिलाते हुए मम्मी कहती है, बेटा आज जल्दी सो जा, तेरा होमवर्क पापा कर देंगे । तुझे कल सुबह जल्दी उठकर कैसे भी करके दूसरे वाले गेम का 1200 वां लेवल पार करना है । 1201 लेवल पर आते ही बैंक खाते में (हाथों को फैलाकर कहती है) इतने सारे रुपये आ जाएंगे ।

पापा भी खुशी खुशी बेटे का होमवर्क कर रहे हैं जो मोबाइल गेम्स से ही संबंधित है । जिसमें तरह तरह के गेम्स की व्याख्याएं लिखने को कहा गया है ।

अगले दिन मम्मी ने सुबह 4 बजे ही मोबाइल चार्ज होने को लगा दिया है ताकि दो ढ़ाई घंटे बाद बेटे को मोबाइल की बैटरी फुल मिले । पापा सुबह उठते ही प्ले स्टोर में कुछ नए गेम सर्च कर रहे हैं ताकि कुछ अतिरिक्त धनवर्षा हो सके ।

फिर बड़े प्यार से बेटे को उठाया जा रहा है । अब बेटा उठकर पापा के खेलने लायक गेम उन्हें बता रहा है । फिर नहा धो कर बाप बेटे अपने अपने मोबाइल ले कर लग जाते हैं गेम की टास्क पूरी करने में ।

मम्मी दोनों के लिए रोज नए नए स्वादिष्ठ पकवान बनाती है और अगर वे गेम की किसी टास्क में उलझे हैं तो अपने हाथों से खिला भी देती है ।




कई मम्मियों को अपने एक या दो बच्चे होने पर अफसोस भी होता है क्योंकि जिनके पांच सात बच्चे है उनकी कमाई भी तो उतनी ज्यादा जो हो रही है ।

कुछ मम्मियां अपने बच्चों को उलाहना भी देती है, "वो वर्माजी के लड़के को देख, तीन दिन में 450 लेवल पार कर लिए, गुप्ताजी की मंझली बेटी तो 700वे लेवल पर पहुंच गई है और तू है कि अभी 300वे पर अटका पड़ा है । कुछ सीख उन लोगों से ।"

क्या अद्भुत कल्पना है ना दोस्तों ।  खैर ये तो एक मजेदार कल्पना मात्र थी । मगर हकीकत ये ही है कि आजकल हर बच्चे बूढ़े के हाथ में ये मोबाइल रूपी खिलौना है । ये जितना सुविधाजनक है उतना ही अगर ज्यादा इस्तेमाल किया जाए तो खतरनाक भी है ।

इसके द्वारा होने वाले शारीरिक और मानसिक नुकसान के बारे में आप भी अक्सर पढ़ते रहते होंगे । अतः जहां तक संभव हो मोबाइल का कम से कम इस्तेमाल करें । विशेषतया बच्चे ।

आजकल एक विशेष प्रकार के गेम की चर्चा भी चारों और है जिसमें किशोर बच्चे फंस रहे हैं और परिणामस्वरूप उसके कुछ दुखदायी समाचार भी सुनने को मिल रहे हैं । इस प्रकार के गेम भूलकर भी ना खेलें । परिजन भी इस बात का विशेष ध्यान रखें और समय समय पर बच्चों के मोबाइल और उनकी मानसिक स्तिथि का पता करते रहें एवं जरूरत पड़े तो कुछ सख्ती भी बरतें ।

अब आपसे विदा चाहूंगा दोस्तों । अपना ध्यान रखें । जल्दी ही फिर मिलते हैं ।

जय हिंद

मुहब्बत की मिठास



*शिव शर्मा की कलम से*







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