Saturday, 2 April 2016

Mumbai Local Train

लोकल ट्रेन

महाराष्ट्र की राजधानी, सपनों की नगरी मुम्बई । समुद्र किनारे बसा भारत का एक खूबसूरत महानगर । जहाँ रोज दूर दूर से अनगिनत लोग आते हैं अपने दिल में हजारों अरमान और आँखों में सैंकड़ों सपने लेकर । कुछ के पुरे होते है और कुछ बस मुम्बई की भीड़ का हिस्सा बन कर रह जाते हैं ।

चौबीसों घंटे भागने वाला ये शहर कभी नहीं थकता है । कहते हैं मुम्बई में पूरा भारत बसता है । देश के सभी प्रान्तों के लोग यहाँ रहते हैं । मुम्बई का दिल बहुत बड़ा है, ये सबको अपने दिल में पनाह दे देती है ।

अब मुम्बई की बात हो और यहाँ की लोकल ट्रेन का जिक्र ना हो, ऐसा हो सकता है भला ? मुम्बई की जीवन रेखा कहलाने वाली लोकल ट्रेन के बिना मुम्बई की कल्पना ही अधूरी है । किसी कारणवश अगर किसी दिन ये रुक जाए तो उस दिन पूरी मुम्बई थम सी जाती है । कई लोग उस अघोषित अवकाश का अपने अपने तरीकों से लुत्फ़ उठाते हैं । समस्या तो उनके लिये होती है जो दिहाड़ी पर काम करते हैं ।

दिन भर में लाखों यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुँचाने वाली मुम्बई लोकल की यात्रा भले ही ऑफिस ऑवर में थोड़ी तकलीफदेह हो, मगर जिंदादिल मुम्बईकर इसका भी भरपूर आनंद उठाते हैं ।

खाली गाड़ी जैसे ही प्लेटफार्म पर आती है, आधे मिनट या इससे भी कम समय में ही गाडी के सभी डिब्बे खचाखच भर जाते हैं ।ये बात कोई माने नहीं रखती की डिब्बा प्रथम दर्जे का है या द्वितीय दर्जे का,  दृश्य लगभग एक सा ही होता है ।

वो आदमी अपने आपको किसी शहंशाह से कम नहीं समझता जिसने अपनी चुस्ती फुर्ती से खिड़की के पास वाली हवादार सीट कब्जे में कर ली हो ।

फिर शुरू होता है अलग अलग डिब्बों में अलग अलग प्रकार की गतिविधियों का दौर । ज्यादातर लोग ग्रुप में होते है जो इस सफ़र के समय का सदुपयोग भजन कीर्तन, अमृतवाणी गा कर करते हैं ।

कुछ ग्रुप तो अपने साथ ढोलक मंजीरे भी ले कर चलते हैं । कमाल की बात ये है कि उस भीड़ में भी, तंग जगह होने के बावजूद ढोलक बजाने की जगह निकाल लेते हैं ।

कुछ जवान भविष्य में गोविंदा जैसा स्टार बनने की चाह लिए मिमिक्री, फ़िल्मी गाने आदि से अन्य यात्रियों का मनोरंजन करते रहते हैं । लेकिन सबसे ज्यादा जो वीरता का कार्य इन लोकल ट्रेनों में होता है वो है ताश खेलना ।

जी हां, सही पढ़ा आपने, लोकल में ताश खेलना कोई कम बहादुरी का काम नहीं है । पांच छह आदमी ताश खेलते हैं, उनके दो चार जासूस अपने आसपास पैनी नजर रखते हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति तो डब्बे में नहीं चढ़ा है ना जो रेलवे विभाग का गाड़ी में ताश खेलने वालों को पकड़ने वाले दस्ते का व्यक्ति हो ।

हर स्टेशन पर खिलाड़ी कुछ पलों के लिए खेल रोक देते हैं और जब जासूस हरा सिग्नल देते हैं तब वापस खेल शुरू हो जाता है । अगर जासूस द्वारा खतरे का अलार्म बजा दिया जाता है तो वही खिलाड़ी लोग देश की ज्वलंत समस्याओ पर जो शास्त्रार्थ करते हैं वो श्रवण योग्य होता है ।

अगर कोई ग्रुप निडर हो कर अपना खेल अंतिम स्टेशन तक जारी रखते हैं तो आप समझ सकते हैं की क्या "सेटिंग" है । सेटिंग वाले भी बहुत से ग्रुप होते है जो उन कर्मचारियों की हर हफ्ते दस दिन में अच्छी "सेवा" करते है ।

लेकिन इन्ही नाना प्रकार के यात्रियों में अधिकतर वो लोग होते हैं जो समय पर अपने दफ्तर पहुंचना चाहते हैं ताकि बॉस से डांट ना खानी पड़े और उन्हें पुरे महीने की पूरी तनख्वाह मिल जाए । क्योंकि उसी तनख्वाह की छोटी सी रकम को लेकर उसने कई तरह के काम सोच रखे होंगे ।

घर का किराया, पत्नी के लिए साड़ी, बच्चे की स्कूल फीस, माँ की दवाई, छोटे भाई के लिए कॉलेज में पहनकर जाने लायक कपड़े, बहन के लिए कान के बूंदे इत्यादि । इस महीने की तनख्वाह में तो इतना ही हो पायेगा, अपने लिए अगले महीने सोचेंगे ।

धन्य है मुम्बई की लोकल ट्रेन जो कितने लोगों को समय पर उनके कार्यालय तक पहुंचा देती है और उस वजह से उनको महीने की पूरी तनख्वाह मिल जाती है । उनकी तो एक ही तमन्ना रहती है कि बस..... लोकल अपने समय पर हरदम चलती रहे ।

आज अपने शब्दों को यहीं विराम देना चाहूंगा दोस्तों । लोकल ट्रेन के मेरे खुद के अनुभव जल्दी ही अपने अगले किसी ब्लॉग में ले कर आऊंगा आप सबके साथ साझा करने को ।

जय हिन्द


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***शिव शर्मा की कलम से**








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5 comments:

  1. अच्छा लेख ।

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  2. धन्यवाद आप सबका

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  3. Yes, there are some real good artists who play the dholak in the crowded locals.

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