Friday, 21 October 2016

Kaash - काश


काश.....



सुनील मेज पर सर झुकाये कुछ ग़मगीन मुद्रा में बैठा था । मैंने आवाज दी तो उसने सर उठाकर मेरी तरफ देखा ।

"क्या बात है भाई, कुछ परेशान से लग रहे हो । सब ठीक है ना ?" मैंने उससे हाथ मिलाते हुए पूछा ।

"हां यार ठीक है सब, बस थोड़ा सा पत्नी की तबियत को लेकर चिंतित था । काश...... उस वक्त तेरी बात मान कर उसे शहर के डॉक्टर को दिखा दिया होता, तो आज ये स्तिथि ना होती ।" सुनील के स्वर से चिंता के भाव स्पष्ट पता चल रहे थे ।

उसकी पत्नी अक्सर पेट दर्द की शिकायत करती रहती थी और वो बिना डॉक्टर की सलाह के ही दवा की दुकान से दवा ले जाता था । मुझे भी तब पता चला था जब आज से करीब तीन महीने पहले वो वहीं दवाई खरीदते हुए मिल गया था जहां मैं भी कोई दवा लेने को गया था ।

तब मैंने उसे कहा था कि भाभी को किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा दे एक बार । युं बिना रोग जाने दवा लेना सही नहीं है । लेकिन लापरवाही या किसी और कारण के चलते शायद वो उसे डॉक्टर के पास नहीं ले गया था ।

"क्यों क्या हुआ, भाभी ठीक तो है ना । तुमने डॉक्टर को दिखाया क्या उन्हें ?" मैंने एक साथ दो तीन सवाल पूछ डाले ।

"हां हां वैसे तो ठीक है परंतु"

"परंतु क्या" मैंने बीच में ही उसकी बात काट कर पूछ लिया ।

"वो डॉक्टर ने कहा है कि पत्नी के पेट में पथरी है जो अब दवाओं से ठीक होनी मुश्किल है, ऑपरेशन करना होगा । काश, उस वक्त तेरा कहा मान लेता, क्योंकि डॉक्टर ने बताया कि अगर दो तीन महीने पहले जांच हो जाती तो शायद दवा से भी इलाज हो जाता । ऑपरेशन नहीं करवाना पड़ता ।" सुनील एक सांस में बताता चला गया ।

"ओह्ह..... मुझे दुःख है कि भाभी को ऑपरेशन की पीड़ा सहनी पड़ेगी । खैर, जो हो गया सो हो गया लेकिन अब और देर मत करना, जितनी जल्दी हो इलाज करवाओ । और मेरे लायक कोई भी काम हो तो बेझिझक बोलना ।"

"नहीं नहीं, अब कोई देरी नहीं करूंगा भाई, कल बुलाया है डॉक्टर ने । छोटा सा ऑपरेशन है । परसों अस्पताल से छुट्टी भी मिल जायेगी ।"




"मैं तो आज इधर से गुजर रहा था तो सोचा तुमसे मिलता चलुं । आ गया तो पता चला, वर्ना तुम तो शायद बताते भी नहीं ।

अभी तो मैं चलता हूं, तुम चिंता मत करना और मेरी किसी भी तरह की मदद की जरुरत हो तो फ़ोन कर देना" मैंने कुर्सी से उठते हुए उससे कहा ।

फिर उससे विदा लेकर मैं वहां से रुखसत हुआ और पैदल ही घर की तरफ चल पड़ा । सुनील की परेशानी जानकर तकलीफ तो हुई, परंतु इस स्तिथि का वो खुद जिम्मेदार था, और कुछ उसकी पत्नी भी, जो बिना डॉक्टर की सलाह के गलत दवाइयां, जो सुनील मेडिकल वाले से सीधा लाता था, ले लेती थी ।

अनायास ही मेरे दिमाग में खयाल आने लगे कि हमारी एक छोटी सी लापरवाही या अतिरिक्त होशियारी, आगे चल के एक बड़ी मुसीबत का रूप ले लेती है । बाद में हम सोचते हैं कि काश उस वक्त ऐसा कर लिया होता ।

समय रहते उचित निर्णय ना लेने की वजह से हमारे जीवन में ये "काश" कई जगह आ के खड़ा हो जाता है । जैसे सुनील, अगर कुछ समय पहले वो अपनी पत्नी के रोग की किसी अच्छे डॉक्टर से जांच करवा लेता तो उसकी पत्नी ऑपरेशन के दर्द से और खुद सुनील मानसिक परेशानी और बेमतलब के होने वाले खर्च से बच जाते ।

आपने भी देखा होगा कि अक्सर जब परीक्षाएं सर पे आ जाती है तब जा के कई विद्यार्थी हाथों में किताब उठाते हैं । समय रहते तो उन्हें लगता है अभी तो दो महीने पड़े हैं, पढ़ लेंगे । अभी एक महीना बाकि है, पढ़ लेंगे । लेकिन बाद में जब परीक्षा परिणाम अवांछित आता है तब पछताते हैं कि डेढ़ दो महीने युं ही बर्बाद कर दिए थे, "काश" उस वक्त समय का उपयोग कर लेते तो परिणाम अलग ही आता ।

इन उदाहरणों के अलावा और भी सैंकड़ों तरह की बातें, घटनाएं हमारे जीवन में होती है जहां बाद में हमें लगता है कि काश हम पहले वैसा कर लेते तो आज स्तिथि दूसरी होती ।

इसलिए मित्रों कोई भी छोटा या बड़ा मसला, चाहे वो स्वास्थ्य संबंधी हो, चाहे आर्थिक, पारिवारिक या शैक्षणिक या अन्य, उन पर तुरंत विचार करके निर्णय लें । खासतौर पर स्वास्थ्य से संबंधित समस्या को तो बढ़ने ना ही दें । क्योंकि वक्त रहते इलाज ना किया जाए तो घाव नासूर बन जाता है और जीवन पर्यंत पीड़ा देता रहता है ।

अब आपसे विदा चाहूंगा । जल्दी ही फिर मिलने के वादे के साथ । आप सबको दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं । अपना और अपनों का ख़याल रखें ।

जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से***








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धन्यवाद

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