Thursday, 16 February 2017

Shubh Yatra - शुभ यात्रा (भाग १)


शुभ यात्रा (यात्रा वृतांत - भाग १)



रेल यात्रा का अनुभव मजेदार तो होता ही है, साथ ही साथ प्रायः हर लंबी दूरी की रेल यात्रा में कुछ ना कुछ ऐसा घटित हो ही जाता है जो यादगार बन जाता है । मैं भी मेरी इस बार की रेल यात्रा का अनुभव आप से साझा कर रहा हुं, जो तकलीफदेह हो सकती थी मगर संयोग से काफी हद तक सुखद यात्रा बन गई ।

पिछले वर्ष की ही बात है, मैं सपरिवार एक पारिवारिक विवाह समारोह में शामिल होने मुम्बई से राजस्थान जा रहा था । अप्रैल का तपता हुआ महीना था । काफी ज्यादा ही गर्मी पड़ रही थी उन दिनों । उस पर तनाव पैदा करने वाली बात ये थी कि, यात्री हम तीन थे, और हमारे पास आरक्षित टिकट मात्र एक ही पत्नी के नाम वाली ही थी ।

बाकि दो टिकटें यात्रा दिवस तक प्रतीक्षा सूची में ही रह गई थी । तत्काल सुविधा में भी नई टिकट लेने की कोशिश की मगर नहीं मिल पाई ।  गनीमत ये हुई कि तीन में से एक टिकट मेरे भांजे ने प्रयास करके रेलवे में कार्यरत अपने एक परिचित अफसर से आग्रह करके महिला कोटे में आरक्षित करवा दी थी । कुछ नहीं होने से तो थोड़ा कुछ होना भी अच्छा ।



जाना भी जरूरी था, अतः ये सोचकर कि अठारह बीस घंटे का ही तो सफर है, कुछ तकलीफ सहकर जैसे तैसे काट लेंगे, अपने मन को तरह तरह की तसल्लियां देने में एक तसल्ली ये भी दे रहे थे कि सुबह भोर में फलां फलां स्टेशन पर गाड़ी लगभग खाली हो जाती है, तो छः सात घंटे आराम करने को मिल जाएंगे । इसी तरह की बातों से अपने मन और खुद को समझा बुझाकर गाड़ी में चढ़ गए ।

अंदर जब डब्बे का दृश्य देखा तो पता चला कि एक आरक्षित और दो प्रतीक्षा सूची वाली टिकट में यात्रा करने वाले यात्री केवल हम ही नहीं थे, और भी बहुत से यात्री थे, जो लगभग हमारी वाली ही स्तिथि में ही थे ।

वैसे भी अप्रैल के महीने में हर वर्ष अमूमन यही स्तिथि रहती है । पुरे महीने हर गाड़ी भरी रहती है । आरक्षित सीट कोई भी खाली नहीं रहती और प्रतीक्षा सूची की हालत तो तौबा तौबा । उस दिन भी उस डिब्बे में मेरे ख़याल से कम से कम 30 प्रतिशत यात्री प्रतीक्षा सूची वाले थे ।

धीरे धीरे हम जब अपनी आरक्षित सीट पर पहुंचे और जब ये पता लगा कि उस कूपे की बाकी पांच सीट एक ही परिवार की थी, और सोने पे सुहागा ये कि उनकी पांचों टिकटें आरक्षित थी, एवं उनके पास सामान भी ज्यादा नहीं था । जानकर राहत मिली की चलो कम से कम बोहनी तो अच्छी हुई है, बाद की बाद में देखेंगे ।

उस दिन शायद भाग्य और समय हमारा साथ दे रहा था । क़्योंकि वे सहयात्री एक तो मिलनसार निकले और दूसरा उनका गंतव्य स्थान वही था, जिसकी हम कल्पना कर रहे थे ।

मेरा दिल तो बल्लियों उछलने लगा कि चलो शुरूआती सफर में थोड़ी तकलीफ उठानी होगी, लेकिन आगे का सफर आराम से कर पाएंगे । कहते हैं ना, अंत भला तो सब भला ।

मैंने पत्नी से धीरे से कहा, भगवान ने तुम्हारी सुन ली, तुम जो हाथ जोड़ कर जो प्रार्थना कर रही थी ना, कि भगवान करे साथ वाले यात्री अच्छे हों, मिलनसार हों आदि आदि । ये तो भगवान ने अच्छे से भी कहीं ज्यादा अच्छा कर दिया । सुबह यही सीटें खाली हो जायेगी, छह की छह हमारी ।' पत्नी के चेहरे पर भी एक सुकून भरी मुस्कान आ गई थी ।

समय और गाड़ी दोनों अपनी रफ़्तार से चल रहे थे । हमें भी उस भले परिवार ने आराम से बैठने की जगह दे दी थी । उन पांच में दो आठ दस साल के बच्चे थे इस लिए बैठने के लिए काफी जगह थी ।




शाम का भोजन करने और कुछ समय गपशप करने के बाद उन भाईसाहब ने कहा कि हमें सुबह जल्दी उतरना है और बच्चों को भी नींद आ रही है सो कुछ समय सो लेते हैं । मैंने भी कहा हां भाईसाहब थोड़ा आराम कर लीजिए । आइये शायिकाएँ खोल देते हैं ।

शायिकाएँ खोल देने से सीट पर बैठने में कुछ दिक्कत सी होने लगी तो मैं और मेरा पुत्र सीटों के बीच नीचे जो खाली जगह होती है वहां अखबार बिछाकर बैठ गए ।

लेटने जितनी जगह नहीं बची थी क्योंकि पहले जो थोड़ा बहुत सामान ऊपर की सीट पर रखा हुआ था वो शायिका पर सोने के लिए वहां से हटाना पड़ा और नीचे रखना पड़ा ।

हम दोनों सीट का सहारा लेकर नीचे बिछाए अखबार पर बैठ गए । पत्नी थोड़ी चिंतित थी कि इतनी देर बैठे बैठे आप लोग थक जाएंगे । मैंने उसे तसल्ली दी कि कुछ ही घंटे की बात है, चिंता मत करो और तुम सो जाओ आराम से ।

हम ये बात कर ही रहे थे तभी साइड वाली सीट, जिस पर दो जने बैठे थे, और इतनी देर के सफर में थोड़ा परिचित भी हो चुके थे, उन्होंने बिना मांगे ही मन माँगा प्रस्ताव दिया कि "भाईसाहब, आप एक काम कीजिये, आप दोनों में से एक तो हमारे साथ बैठ जाइए, और एक इस जगह का उपयोग थोड़ा आड़ा टेढ़ा हो कर सोने में कर लीजिए, दो चार घंटे की ही तो बात है । और हम तो वैसे भी आज सोने वाले हैं नहीं, सोयेंगे तो अब तो घर जाकर ही ।" घर जाने की ख़ुशी उसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी ।

ख़ुशी तो होती ही है अपने घर जाने की । अपने परिवार से मिलने की, अपने मित्रों से मिलने की । अपनी मिटटी, अपना गांव, अपने लोग । तभी तो हम भी एक टिकट पर तीन जने निकल पड़े थे ।

मुझे थोड़ा सा झिझकते हुए देख कर वो फिर बोले, "आ जाइये, आ जाइये भाईजी, झिझकिये मत, यहाँ बैठ जाइए । नीचे बैठे रहने से तो बेहतर है सीट पर बैठें । कम से कम पैर तो सीधे रहेंगे ।" बात सही भी थी, इसलिए उनकी बात मानकर मैं उनके साथ सीट पर बैठ गया और बेटे ने मेरे कहने पर नीचे ही, सामान को थोड़ा दाये बाएं करके सोने लायक जगह बनाली और लेट गया ।

अब जाके मुझे थोड़े सुकून का अहसास हुआ कि चलो ये माँ बेटे तो थोड़ा आराम कर लेंगे और जब सुबह भीड़ छंट जायेगी तो मैं भी कुछ देर लंबी तान लूंगा । थोड़ा सुस्ता लूंगा ।

हम दोनों को कुछ आरामदायक स्तिथि में देखकर पत्नी के चेहरे पर थोड़ी राहत के भाव दिखाई दिए ।

जैसे जैसे रात गुजर रही थी प्रायः सब ऊँघने लग गए थे । हमने भी बैठे बैठे एक आध झपकी ले ही ली थी । पत्नी सीट पर और बेटा अखबारों के बिस्तरे पर आराम से सो रहे थे । नींद भी क्या चीज है, नहीं आये तो गद्देदार बिस्तर पर भी नहीं आती और आनी हो तो ना गद्दा चाहिए ना तकिया ।

रात गहरी होते होते डब्बे में काफी हद तक सन्नाटा पसर चूका था । मुझे भी सीट पर बैठे बैठे झपकियों के रूप में थोड़ी थोड़ी नींद आ रही थी । घड़ी की सुइयां समय के साथ साथ लगातार चल रही थी ।

इस बार मेरी झपकी टूटी उसका कारण डब्बे में होने वाली हलचल थी । जिनके साथ मैं बैठा था उन्होंने ही कहा भाईजी, हमारा स्टेशन आने वाला है, यहां डिब्बे से बहुत से यात्री उतरेंगे, फिर वो मुस्कुरा कर बोला, अब आप अपनी पसंद की कोई शायिका चुनकर आराम से सो सकते हैं ।

मैंने भी मुस्कुरा कर उन दोनों का आभार व्यक्त किया जिनकी वजह से मैं काफी हद तक थोड़ा आराम कर सका ।

मैंने समय देखा, सुबह के पांच बजने वाले थे । शुक्र था कि गाड़ी अपने समय पर चल रही थी । पत्नी और बेटा भी शोरगुल सुनकर जाग गए थे । कुछ ही देर में ठीक समय पर वो स्टेशन आ गया और वाकई पांच मिनट में ही डिब्बा लगभग खाली हो गया । मेरे ख्याल में पूरे डिब्बे में अब मात्र 35-40 यात्री बचे थे ।

मैंने राहत की एक लम्बी सांस ली, तब तक बेटा ऊपरवाली एक बर्थ पर अपना कब्जा जमा चूका था । गाडी वापस चल पड़ी थी । पत्नी ने कहा, अब आप भी थोड़ी देर सो लीजिये, पूरी रात से आप बैठे बैठे सफर कर रहे थे ।



मैं भी ऊपर की ही बर्थ पर जाकर सो गया, और नींद तो जैसे इसका ही इन्तजार कर रही थी कि कब मैं आराम से लेटु और कब वो आये । तकरीबन तीन घंटे मैं घनघोर नींद सोया । वो तो प्राकृतिक समस्या की वजह से नींद खुल गयी वरना नींद तो पूरी हुई ही नहीं थी ।

पत्नी और पुत्र दोनों उठ गए थे और खाली पड़ी सीट पर आराम से बैठे थे । मुझे नीचे उतरते देख पत्नी बोली, अरे, इतनी जल्दी क्यों उठ गए । अभी तो बहुत समय है अपना स्टेशन आने में, सो जाओ कुछ और देर । मैंने कहा हां देखते है, परंतु रोजमर्रा के कुछ जरुरी कार्य निपटाने के बाद । ये कहकर मैं साबुन लेकर शौचालय की तरफ चला गया ।

तरोताजा होकर वापस आने तक नींद लगभग उड़ चुकी थी तो मैं भी उन दोनों के साथ ही सीट पर बैठ गया और रात की यात्रा की बातें करने लगे ।

इतने में चाय चाय गरम चाय की आवाज लगता चाय वाला आया और हमने तीन चाय ली । फिर जैसे ही मैंने पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला तो ये क्या !

जेब में से पर्स गायब ! ........
.........

मित्रों यात्रा वृतांत कुछ लंबा बन पड़ा, हालांकि जहां जहां संभव हो सका मैंने इसे कम शब्दों में समेटने का प्रयास किया । फिर भी मजबूरन इस यात्रा वृतांत को दो भागों में करना पड़ेगा, आशा है आप इसे स्वीकार करेंगे । दूसरा भाग कल ही आपकी सेवा में हाजिर होगा तब तक के लिए विदा दोस्तों ।


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जयहिंद

*शिव शर्मा की कलम से***









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