Wednesday, 8 August 2018

काका - Hindi Story

काका


प्रहलादजी मास्टर जी पांच छः वर्ष पूर्व ही कहीं बहुत दूर से इस गांव में रहने आये थे और अपने अच्छे स्वभाव से जल्दी ही सबसे घुलमिल गए थे ।

गांव के सरपंच की मदद से उन्होंने एक छोटी सी कक्षा खोल ली थी जहां वो हर क्लास के बच्चों को पढ़ाया करते थे । पढ़ाने का शुल्क बस इतना ही लेते थे कि अपना जीवन यापन कर सके ।

गांव वाले उनके बारे में इतना ही जानते थे कि ये बहुत दूर से आये हैं और सरपंच साब की पहचान वाले हैं ।

गांव वाले कभी कभार उनसे पूछते रहते थे कि मास्टर जी अपने बारे में कुछ बताइये, तो वो मुस्कुराकर इतना ही कहते क्या करोगे भाई जानकर ।

गर्मियों की एक शाम को एक बार मास्टरजी, सरपंच और कुछ गांव वाले गांव में बने एक छोटे से बाग में बैठे गपशप कर रहे थे । बात बात में बात चल पड़ी कि आदमी के पास कितना पैसा होना चाहिए । और इसे कमाने के लिए क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए ।

सबकी अलग अलग राय थी । अंत में जब मास्टरजी से पूछा गया तो उन्होंने कहा "एक अच्छा जीवन जीने जितना पैसा होना चाहिए, लेकिन इसे कमाने के लिए अपनी योग्यतानुसार काम करना चाहिए । पैसे कमाने के लिए गलत काम कभी नहीं करने चाहिए, क्योंकि बुरे काम का नतीजा हमेशा बुरा ही होता है ।"

"जैसे" एक ग्रामवासी ने पूछा तो मास्टर जी बोले ।

आज मैं इसी विषय पर आपको एक सच्ची घटना बताता हूं ।

एक गांव में कमल नामक एक लड़का रहता था । सीधा सादा और हमेशा खुशमिजाज रहे वाला कमल गांव में काका के नाम से प्रसिद्ध था । सबसे हंसकर मिलना और हर छोटे बड़े को सम्मान देना उसके स्वभाव में शामिल था । एक चिर परिचित मुस्कान हमेशा उसके चेहरे पर रहती थी ।

उसका नाम काका कैसे पड़ा ये भी एक पहेली थी । उसके दोस्त बताते थे कि स्कूल के समय कमल राजेश खन्ना साहब की नकल किया करता था, शायद इसीलिए वो काका के नाम से प्रसिद्ध हो गया था ।

काका अपने माता पिता की इकलौती संतान था और संयोगवश काका को भी एक ही पुत्र था, आनंद ।

आनंद का जन्म काका के विवाह के लगभग पांच वर्षोपरांत हुआ था । काका के माता पिता जो दादा दादी बनने को तरस रहे थे वे पोते को देखकर कितने प्रसन्न हुए थे । छोटा सा परिवार सुख से अपना जीवन गुजार रहा था ।

परंतु विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था । आनंद के जन्म के महज छः महीने बाद ही बीमार चल रहे काका के पिता का देहांत हो गया और उनके पीछे पीछे ही दो महीने बाद मां भी चल बसी । शायद वो अपने पति के विरह को ना सह सकी थी । समय के साथ काका ने अपने आप को इस दुख से उबार लिया था ।

शहर की नोकरी से काका का घर खर्च आराम से निकल जाता था । काम पर आने जाने के लिए वो रोज साईकल से 8 किलोमीटर की यात्रा किया करता था ।

पिताजी की बीमारी की वजह से वो खुद स्कूल से आगे नहीं पढ़ पाया था लेकिन आनंद को पढ़ा लिखाकर वो बड़ा आदमी बनाने के सपने देखा करता था । तभी तो आनंद जब स्कूल जाने योग्य हुआ तो काका ने उसे शहर की सबसे अच्छी स्कूल में डाला था ।  कहता था कि थोड़ी महंगी जरूर है पर थोड़ा ज्यादा काम करके कुछ अतिरिक्त आय कर लूंगा ।

अनेकों तकलीफें सहकर भी काका ने आनंद की परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी । आनंद जब कॉलेज में आया तो शहर के कॉलेज आने जाने के लिए, कर्ज ले कर, काका ने उसे मोटरसायकिल दिला दी थी । आनंद भी उसकी उम्मीदों पर खरा उतर रहा था और हमेशा अच्छे नम्बरों से पास होता था ।

आनंद पढ़ाई में तो होशियार था ही, उसके सपने भी बड़े ऊंचे थे । वो अक्सर अपने पिता को पाई पाई के हिसाब से चलते देखता तो कहता था "पापा देखना, मैं बहुत पैसे कमाऊंगा और एक दिन आपको कार लाके दूंगा । फिर हम यहां इस छोटे से गांव में नहीं, किसी बड़े शहर में रहेंगे ।"

काका उसकी बात को हंसकर टाल देता था और समझाता कि बेटा खूब कमाना, कार भी ले आना, मगर मेहनत और ईमानदारी से ।

पढ़ाई पूरी करके और अपनी डिग्री प्राप्त करके आनंद मुम्बई चला गया । वहां पर उसे एक कम्पनी में नोकरी मिल गयी थी । अच्छी खासी तनख्वाह थी, इतनी कि कुछ महीनों बाद उसने किराए पर एक घर ले लिया और काका काकी को भी जिद्द करके अपने साथ मुम्बई ले गया ।

अच्छी कमाई होने के बावजूद भी आनंद उस से संतुष्ट नहीं था । वो शीघ्रतिशीघ्र खूब दौलत कमाना चाहता था ।

काका उसे समझाया करता था कि जो कमाई तुम्हारी है वो हमारे छोटे से परिवार के लिए काफी है । एक सुखी जीवन के लिए जो चाहिए वो सब कुछ हमें मिल रहा है, फिर क्यों ज्यादा के पीछे भागना ।

लेकिन आनंद नहीं समझा और पैसों के लालच में वो गलत काम भी करने लग गया । पढ़ा लिखा और तेज दिमाग तो था ही । कई तरह की तिकड़म लगाकर पैसों के लिए छोटे मोटे गैर कानूनी काम भी करने लग गया ।

काका काकी इन सबसे अनजान थे । कभी कभी तो वो रात रात भर घर नहीं आता था । हां फोन जरूर कर देता था कि आज वो घर नहीं आ पाएगा ।

काका ने जब उससे पूछा था की बेटा आजकल काफी देर से आते हो और कभी कभी रात को भी नहीं आते तो उसने कहा था कि आजकल जिम्मेदारी और काम ज्यादा बढ़ गया है, इसलिए देर हो जाती है । और हां, खुशखबरी सुनो पापा कि काम के साथ साथ मेरी तनख्वाह भी बढ़ गई है, आनंद ने हंसते हुए कहा था ।

काका काकी भी बेटे की कामयाबी पर खुश थे और सोचते थे कि बेटा ऑफिस में बहुत व्यस्त है । परंतु कभी कभी उदास भी हो जाते कि बेटा कितना काम करता है ।




इसी तरह एक साल गुजर गया । इस बीच आनंद ने मुम्बई में अपना खुद का एक छोटा सा घर भी ले लिया ।

काका ने फिर उससे पूछा कि बेटा इतने पैसे कहां से आये, तो आनंद ने फिर सीधे साधे काका को बातों में घुमा दिया कि "कुछ ऑफिस से और कुछ अपने दोस्तों से कर्ज लिया है जो मैं जल्दी ही चुका दूंगा । मैंने आपको बताया था ना कि मेरी तनख्वाह बढ़ गई है ।"

काका ने भी विश्वास कर लिया । ना मानने जैसी कोई बात भी तो नहीं थी । कुछ दिन बाद काका ने भी आनंद से कहकर, समय काटने के लिए, घर के नीचे ही एक जनरल स्टोर करली थी ।

समय अच्छाखासा चल रहा था । किसी चीज की कोई कमी नहीं थी । काका दुकान में मस्त और काकी घर संभालने में । काका की नजर में बेटा भी अपनी मेहनत और लगन से अच्छा कमा रहा था ।

मगर कहते हैं ना बुरे काम का बुरा नतीजा, वही हुआ ।

एक बार जब दो दिन तक आनंद का ना फोन आया ना वो खुद, तो काका ने डरते डरते आनंद की ऑफिस में फोन किया ।

डरते डरते इसलिए क्योंकि आनंद ने उन्हें कह रखा था कि हमारी ऑफिस के नियम बड़े सख्त है । बहुत जरूरी हो तो ही किसी कर्मचारी के घर वाले उसे फोन कर सकते हैं, अतः आप भी मत करना । जरूरत हुई तो मैं कर लूंगा ।

फोन के प्रत्युत्तर में जो जवाब काका को मिला था वो सुनकर तो वो सन्न रह गया । ऑफिस वालों ने बताया कि आनंद ने तो करीब डेढ़ वर्ष पहले ही नोकरी छोड़ दी थी ।



"फिर इतना पैसा वो कहाँ से लाता है" काकी के इस प्रश्न का काका के पास कोई जवाब नहीं था । लेकिन जवाब भी तुरंत मिल गया जब दरवाजे पर दस्तक हुई ।

दरवाजा खोला तो सामने पुलिस को देखकर अचंभित काका काकी कुछ अनहोनी की आशंका से भर उठे ।

"आप कमल जी हैं" पुलिस वाले ने काका को संबोधित करके पूछा ।

"जी हां, क्या बात है" काका ने घबराहट भरे स्वर में पूछा ।

"आपको हमारे साथ थाने चलना होगा । बयान लेना है, हो सकता है आपको पता हो या ना हो लेकिन आपका बेटा धोखाधड़ी और ठगी के जुर्म में गिरफ्तार है ।"

इतना सुनकर काका और काकी तो जैसे जड़ ही हो गए थे । कहाँ वो तीन चार दिन पहले आनंद के विवाह के बारे में चर्चा कर रहे थे और अचानक ये वज्रपात ।

थाने से वापस आते वक्त काका काकी के पांव जैसे जमीन में धंस रहे थे । जिस आनंद को दो साल पहले उसकी चमचमाती ऑफिस में बड़ी वाली कुर्सी पर बैठे देखा था वो आज जेल में बंद था ।

उसके बाद दो साल तक काका ने कोर्ट कचहरी के बहुत चक्कर काटे । लेकिन आनंद को सजा से नहीं बचा पाया । उसे सात वर्ष की सजा हो गई और इधर उसके कमाए हुए सारे काले पैसे भी खर्च हो गए । बेचारे सीधे साधे काका के सारे सपने लड़के के लालच की भेंट चढ़ गए ।

काकी इस सदमे को सह नहीं पाई थी और बीमार रहने लगी थी । भीतर ही भीतर काका भी टूट चुका था । जब हर तरफ से वो हर गया और काकी का स्वास्थ्य भी दिनबदिन खराब होता जा रहा था इसलिए वो सब कुछ छोड़ छाड़ कर वापस अपने गांव आ गया ।

काकी उसके बाद ज्यादा दिन नहीं निकाल सकी और एक दिन इस संसार को अलविदा कह गई । काका का मन इन सब घटनाओं के चलते संसार से विरक्त हो गया और एक दिन वो गांव छोड़कर पता नहीं कहाँ चला गया ।

"और आनंद का क्या हुआ मास्टर जी" जिज्ञासावश एक गांववासी ने पूछ लिया ।

आनंद जेल से छूट कर जब गांव आया तो उसकी दुनिया उजड़ चुकी थी । कुछ वर्ष उसने दिल्ली शहर में काम किया और अपने पिता को खोजने का प्रयास किया । बीते वर्षों में वो अब पूर्ण रूप से बदल चुका था, वो ये जान गया था कि पैसा अपनी मेहनत से ही कमाना चाहिए और हमेशा अपने बड़ों की सीख माननी चाहिए ।

हालांकि उसे उसके पिता तो नहीं मिले लेकिन एक मित्र जरूर मिल गया था जिसने उसकी पूरी कहानी जानकर भी उसकी बहुत मदद की ।

"तो अब आनंद और उसका वो मित्र कहां है" एक प्रश्न और आया ।

जिसका जवाब सरपंच साब ने दिया "आनंद आपको अपनी कहानी सुना रहा है और उसका मित्र आपका सरपंच है ।"

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जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*








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