Sunday, 29 November 2015

बाबुल का घर - Babul Ka Ghar, The sweet memory of a father about his Daughter


बाबुल का घर -  Babul Ka Ghar


The sweet memory of a father about his Daughter

पांच साल की नन्ही सी आस्था खूब मस्ती कर रही थी । पुरे घर में भागती फिर रही थी । पापा मम्मी भी उसकी बाल क्रीड़ाओं का आनद ले रहे थे और उसके साथ साथ अपना बचपन वापस जी रहे थे । वो कभी मेज के निचे छुप जाती तो कभी दरवाजे के पीछे । फिर आवाज लगाती "पापा बताओ मैं कहाँ हुं । मम्मी मुझे ढूंढो ।"

और पापा मम्मी दोनों जानबूझकर अनजान बन कर तुतलाते हुए बोलते "अले अले, आस्था कहां चली गयी, अभी अभी तो यहीं थी, ढूंढो ढूंढो उसे जल्दी से, नहीं तो पापा का मन कैसे लगेगा । मम्मी शाम को परियों वाली कहानी किसे सुनाएगी ।"


बाबुल का घर




आस्था भी अपनी जीत पर खुश होकर घुंघरुओं की सी खनकती आवाज में हंस देती और पापा ऐसा दर्शाते हुए उसे पकड़ लेते जैसे उसकी हंसी की आवाज से वो पकड़ी गयी । "अरे ये तो अपनी गुड़िया हंस रही है, देखो तो आस्था की मम्मी, शायद ये आवाज मेज के निचे से आ रही है ।"

मम्मी मेज के निचे देखकर कुछ बोलती उस से पहले आस्था अपनी नन्ही सी ऊँगली अपने मुंह पर रखकर मम्मी को चुप रहने का इशारा करती । उसकी मम्मी भी उसके साथ बच्चा बन जाया करती थी । "मेज के निचे तो नहीं दिख रही है जी, लगता है बाहर गली में से उसकी हंसी की आवाज आई थी । चलिए बाहर ढूंढते है उसे ।"


और पापा बनावटी चिंता वाली आवाज में कहते "अरे जल्दी चलो उसे ढूंढ के लाते हैं, फिर बाजार भी तो चलना है ।"

तब हंसती हुयी आस्था मेज के निचे से निकलती और धीरे से पीछे से आकर पापा की आँखों पर अपने दोनों हाथ रख देती । पापा उन हाथों को छूकर कहते । ये कोमल कोमल हाथ तो मेरी गुड़िया के हैं । फिर छोटे छोटे हाथों को चूमते और घूम कर आस्था को गोदी में उठा लेते थे ।


बाबुल का घर


दादा दादी तो उसके बिना एक पल भी नहीं रहते थे । शाम को दादाजी के साथ परमू चाचा की दुकान से चूरन वाली गोलियां लेने जाने का तो दादा पोती का रोज का नियम सा बन गया था ।

"कहां खो गए जनाब" कमरे में आती पत्नी गंगा की आवाज कानों में पड़ी तो हरीश जैसे नींद से जागा ।

"जल्दी करो, पिताजी और चाचाजी प्रतीक्षा कर रहे हैं, लड़का देखने जाना हैं । और ये आपके हाथ में क्या है ? अरे, ये तो आस्था की तब की फ़ोटो है जब वो पांच साल की थी । समझ गयी......,  आप फिर खो गए ना यादों में ?"



"अरे नहीं नहीं बस यूँ ही" हरीश अपनी पलकों पर ढलक आये आंसुओं को छुपाने की असफल कोशिश करता हुआ बोला ।

"हरीश, मैं आपकी अर्धांगिनी हुं, आपके मन की हर बात समझ सकती हुं । जब से आस्था की सगाई की चर्चा चली है आप गुमसुम से, खोये खोये से रहते है, लेकिन ये संसार की रीत है कि बेटी को एक ना एक दिन पिता का घर छोड़ कर पिया के घर जाना ही पड़ता है । मैं भी तो आई थी आपके साथ ।" गंगा का गला भी थोड़ा रुंध सा गया था कहते कहते ।

"क्या हुआ बहु" समय लगते देख बाहर से मां ने आवाज लगाई और कमरे के भीतर आ गयी ।


बाबुल का घर


"कुछ नहीं माँजी, आपके पुत्र थोड़े भावुक हो गए थे आस्था के दूर जाने की सोचकर ।"

मां ने हरीश के कंधे पर हाथ रखा और कहा "बेटा, मैं जानती हुं इतने वर्षों तक साथ रही बेटी को विदा करने की सोचना बहुत कष्टदायक है, लेकिन बेटियां एक उम्र के बाद अपने पिता के घर की बजाय ससुराल में ही अच्छी लगती है । इसलिए जाओ और लड़का देख के आओ, अच्छा परिवार है उनका, हमारी गुड़िया राज करेगी, वहां पर ।"

जी मां, कहकर हरीश कमरे से बाहर निकल आया । आँगन में छोटे भाई को पढ़ा रही आस्था को देखकर उसका मन फिर भर आया, और वो सोचने लगा, ये समय भी कितनी जल्दी गुजर जाता है । कल तक अपनी चंचल शरारतों से सबके मन हरषाने वाली, सबके दिलों पर राज करने वाली आस्था कुछ ही दिनों में हम सबको छोड़ जायेगी,  अपनी एक नई दुनिया बसाने ।


पार्श्व में कहीं से एक गीत सुनाई पड़ रहा था ।

"बेटी घर बाबुल के, किसी और की अमानत है ।
दस्तूर दुनिया का, हम सबको निभाना है ।।"


बाबुल का घर

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...शिव शर्मा की कलम से...















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