Wednesday, 16 March 2016

Bhatkte Kadam

भटकते कदम


गरीब परिवार का एक लड़का अजय पढाई में बहुत होशियार था । बड़ा होकर डॉक्टर बनने का सपना उसकी आँखों में पल रहा था, और उसी के मद्देनजर वो पूरी लगन से अपनी पढाई में लगा हुआ था ।

उसके परिवार जनों ने भी उसको ले के बहुत से सपने पाल रखे थे कि बेटा पढ़लिख कर कुछ लायक बन जाये तो हमारी गरीबी दूर हो ।

समय अपनी रफ़्तार से चलता रहता है । अजय हर क्लास में अच्छे नंबरों से पास होता गया । स्कूल से निकलकर कॉलेज में आ गया ।सरकारी कॉलेज थी । सरकार की तरफ से काफी तगड़ा अनुदान उस कॉलेज को मिलता था इस वजह से वहां की फीस और होस्टल इत्यादि का खर्च लगभग ना के बराबर ही था ।

शायद ये कॉलेज अजय जैसे छात्रों के लिए ही था जो पढ़ना चाहते हैं मगर पैसों की वजह से मज़बूरी में उन्हें पढाई बीच में छोड़नी पड़ जाती है ।

नया वातावरण, नए नए लोग । स्कूल जितनी बंदिशें भी यहाँ नहीं थी । कुछ ही दिनों में अजय के काफी सारे नए दोस्त भी बन गए थे जिनमें लगभग हर तरह के लड़के शामिल थे । कुछेक पढ़ाकू थे लेकिन अधिकतर मस्तीखोर ही थे, जिनका कॉलेज में एडमिशन लेने का मकसद ही ढेर सारी मस्तियाँ करना था ।

एकदम स्वच्छंद खुली हवा में अपने नए मित्रो के साथ, कॉलेज का प्रथम वर्ष पूरा होते होते अजय उस वातावरण के रंग में पूर्णतया रंग चूका था । कॉलेज के कुछ कार्यक्रमों में उसने दो चार बार मंच से भाषण भी दिए जिस वजह से पुरे कॉलेज में उसकी पहचान बन गयी थी । और अजय अपने आप को स्टार समझने लग गया था ।

नेतागीरी का भूत भी उसके सर पर सवार हो चूका था । स्टार तो था ही अपनी नजर में, उस पर उन्ही कथित दोस्तों के कहे में आकर उसने कॉलेज के छात्रसंघ के चुनाव में थोड़ी ना नुकर के बाद अपना नामांकन करवा दिया ।

चुनाव आने तक काफी उठापटक भी हुयी, पुराने और सीनियर "नेता" इस बात को हजम नहीं कर पा रहे थे की प्रथम वर्ष का छोकरा उनके सामने चुनाव लड़ेगा ।

चुनावों के दौरान अजय को पता चला की बहुत सी राजनितिक पार्टियां भी कॉलेजों के चुनाव में दिलचस्पी लेती है । उसे भी एक दो पार्टियों का समर्थन, संरक्षण और कुछ पैसे भी मिले ।

निश्चित समय पर चुनाव हुए और आश्चर्यजनक रूप से परिणाम उसके पक्ष में आ गया । अब वो कॉलेज छात्रसंघ का अध्यक्ष बन चूका था । उसे लगने लगा कि वो एक "हस्ती" बन चूका है ।

उसके चारों और भीड़ रहने लगी । धीरे धीरे भाषण बाजी का शौक उसकी आदत में शुमार होता गया । अब वो हर मुद्दे पर कहीं भी कभी भी शुरू हो जाता और कॉलेज प्रशाशन के खिलाफ अनर्गल बातें करना शुरू कर देता । उसके आजु बाजू अंगरक्षक की तरह रहने वाले लड़के लड़कियां तालियां बजाकर उसकी हौसलाअफजाई करते रहते । उस वक्त वो खुद को किसी शहंशाह से कम नहीं समझता । एक पढ़ाकू लड़के के कदम बहक रहे थे ।

धीरे धीरे उसके भाषण उग्र होते गए । कॉलेज प्रशाशन और वाकई पढ़ने आये छात्रों को काफी असुविधा होने लगी । लेकिन क्या करें । वो अध्यक्ष जो था ।

एक दिन किसी मुद्दे पर हमेशा की तरह कॉलेज प्रशाशन के खिलाफ अंटशंट बोलते बोलते जोश में होश खो बैठा और कॉलेज के ट्रस्टीज यानि सरकार के बारे में बहुत कुछ बोल गया । कुछ ऐसे वैसे नारे भी लगा डाले ।

उन नारों को सुन कर उसकी बातों पर तालियां बजाने वाले लड़के जोश में आके भड़क उठे और तोड़ फोड़ करके कॉलेज की संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाया । उनको समझाने आये कॉलेज के एक लेक्चरर पर अजय ने हाथ भी उठा दिया और उन्हें बुरी तरह मारा पीटा ।

मामला गंभीर होते देख प्रिंसिपल ने पुलिस बुला ली । पुलिस की गाड़ी के साइरन की आवाज जैसे ही कॉलेज की फ़िजां में गूंजी, तो अध्यक्ष महोदय के होश, और हमेशा घेरे रहने वाले लड़के, दोनों गायब हो गए ।

पुलिस उसे उस दिन पकड़ कर जो पूछताछ के लिए ले कर क्या गयी, अजय आज तक वापस नहीं आया है । अदालत ने उसे सजा सुना कर जेल भेज दिया ।

उसके कुछ साथियों को भी जेल और कुछ पर जुर्माने की सजा मिली । क्योंकि वो सारी घटना कॉलेज प्रांगण में लगे केमरे में कैद हो चुकी थी जो उनके खिलाफ काफी मजबूत सबूत था । कॉलेज ने उसे कॉलेज से निष्काषित कर दिया ।

अजय के पिता इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया है, उसकी माँ छोटे मोटे काम करती है और जैसे तैसे घर खर्च चला रही है । उनकी गरीबी दूर करने वाला बेटा तो जेल में है ।

उधर जेल में बैठा अजय शायद ये ही सोच रहा होगा ।

"एक गलत कदम उठा जो राहे शौक में,
मंजिल तमाम उम्र मुझे ढूंढती रही ।"

नोट : उपरोक्त कहानी महज एक काल्पनिक कहानी है और इसका किसी भी घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है ।

Click here to read "आखिर दीवाली जो है" Written by Sri Shiv Sharma


...शिव शर्मा की कलम से...









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