Tuesday, 20 October 2015

काळू - Kalu


The story of Kalu - Kalu Ki Kahani


पुरे मोहल्ले में वह काळू के नाम से प्रसिद्द था । काळू बहुत हंसमुख स्वभाव का और हाजिरजवाब था इस वजह से मोहल्ले में लोकप्रिय भी था । जब भी कभी चौपाल पर गाँव वाले बैठते थे काळू बात पकड़ पकड़ कर चुटकुले सुनाकर सबको खूब हंसाया करता था।  (Hindi Story)


एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया था की यार तेरा ये नाम कैसे पड़ा । तो उसने बताया की जन्म के समय उसका रंग काला था इसलिए घरवालों ने काळू नाम दे दिया वैसे मेरा नाम नवीन है । वैसे भाई नाम में क्या रखा है स्टेशन पर जो लंगड़ा भिखारी है उसका नाम मालचंद है । उसकी ये बात सुन के हम खूब हंसे थे । (Hindi Story)

एक बार काळू के साथ ट्रेन में सफ़र करने का संयोग हुआ । सारा सामान व्यवस्थित रखने के बाद काळू जो शुरू हुआ तो 8 घंटे का सफ़र कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला । सहयात्री भी काळू से कुछ ही समय में परिचित हो गए थे ।

टी टी ई जब टिकट चेक करने आया तो काळू ने कहा साहब आप सबसे टिकट पूछते हैं आपकी खुद की टिकट कहाँ है? टी टी ने मुस्कुरा कर अपना परिचय पत्र दिखाया और कहा की ये सरकार ने दिया है इसलिए मुझे टिकट लेने की आवश्यकता नहीं है, तो काळू ने भी अपना ड्राइविंग लाइसेंस निकाला और पूछा ये भी सरकार ने ही दिया है फिर हमें क्यों टिकट लेनी पड़ती है । टी टी ई मुस्कुराता हुआ अगले यात्रियों की टिकटे चेक करने चला गया। (Hindi Story)

कोई बीमार होता तो उसकी आधी बीमारी तो काळू की बातें सुनकर ही ठीक हो जाती थी ।

एक बार हमारे मोहल्ले के एक बुजुर्ग चलते चलते गिर पड़े, शरीर के थोड़े भारी भी थे, उसी वक्त संयोग से भूकंप का हल्का सा कम्पन भी हुआ । ऐसी स्तिथि में भी काळू नहीं चूका और बुजुर्ग से बोला "बाबा भूकंप आया तो आप गिरे या आपके गिरने से भूकंप आया"।
समय के साथ सब कुछ बदलता जाता है । आज काळू विदेश में एक बड़ी सी कंपनी में काम करता है । कभी कभार फ़ोन पर बात हो जाती है । कई साल बीत गए काळू से मिलने का संयोग नहीं बैठा । (Hindi Story)

लेकिन कहते है ना धरती गोल है, कभी न कभी तो घूमते घूमते मुझे और काळू को कहीं न कहीं मिला ही देगी।

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