Monday, 26 October 2015

काळू का दूसरा रूप - The other side of Kalu.

गाँव में सालाना जलसे की तैयारियां जोरशोर से चल रही थी । हर कोई व्यस्त नजर आ रहा था । हर साल दशहरे पर गाँव में तरह तरह के खेल हुआ करते थे और जितने वाले को पुरष्कृत किया जाता था ।

इस साल 500 मीटर की दौड़ में सबसे ज्यादा राशि पुरष्कार स्वरुप रखी गयी थी, पुरे दस हजार रुपये । सबके मुंह पर एक ही बात थी कि ये दस हजार का पुरष्कार काळू के हिस्से में ही जाने वाला है ।


जी हां वही काळू, बहुत ही हंसमुख, हाजिर जवाब और सबका प्रिय । काळू इन सबके साथ साथ अच्छा धावक भी था । हर वर्ष दौड़ में वो ही प्रथम आया करता था । दूसरे धावक भी कहते थे काळू तो राकेट है राकेट । हवा की तरह भागता है । काळू से जीतना मुश्किल है । लेकिन काळू से जब जीत का राज पूछा जाता तो कहता "जी मैं तो ये सोच के भागता हूँ की पीछे कोई कटखना कुत्ता लगा है, अगर रुका तो वो काट लेगा"।

इस बार गाँव में एक नया परिवार आया था । प्रवीण और उसके बूढ़े माता पिता । गरीब लेकिन मिलनसार और खुद्दार परिवार था । पिता दिहाड़ी मजदूरी का काम करके परिवार चलाते थे। प्रवीण की माँ बीमार रहती थी पता नहीं क्या बीमारी थी लेकिन गाँव वाले बताते थे की इसका इलाज शहर के अस्पताल में हो सकता है मगर  उसके इलाज के लिए उन लोगों के पास इतने पैसे नहीं थे कि उसे शहर ले जा सके।

प्रवीण भी कॉलेज से आने के बाद पिता के साथ मजदूरी करके उनका हाथ भी बंटाता था। उसको भी कुछ पैसे मिल जाया करते थे।

एक दिन काळू ने मुझसे कहा "भाईजी आप प्रवीण से कहो ना दौड़ में हिस्सा ले" क्या पता वो जीत जाए तो उन पैसों से उसकी माँ का इलाज हो जाए और वो स्वस्थ हो जाए । और हाँ, उसे ये मत कहना की मैंने आपको इसके लिए कहा था"।

मैंने हंसकर कहा "काळू, आसपास के दस गाँवों में कोई है जो तुझसे दौड़ में मुकाबला कर सके? फिर भी तुम कहते हो तो मैं बोलूंगा उसे"।

मैंने प्रवीण से बात की तो उसने बड़े ही सम्मानजनक शब्दों में कहा "भाईजी काळू भैया के होते हुए मैं दौड़ में हिस्सा लूं ये मुझे अच्छा नहीं लगेगा, वो बहुत अच्छे धावक और उतने ही अच्छे इंसान है, मैं भी उनका बहुत आदर करता हूँ"। अब उसको मैं कैसे बताता की उसी काळू ने मुझे उसे दौड़ में हिस्सा लेने के लिए कहा है क्योंकि काळू ने मुझे बताने से मना किया था । लेकिन मैंने उससे कहा की प्रवीण ये सिर्फ एक प्रतिस्पृद्धा है, हार या जीत अपनी मेहनत पर निर्भर है, हम सब जानते है काळू जीत का पक्का दावेदार है लेकिन काळू से हारना भी तो तुम्हारे लिए गर्व की बात होगी ।

थोड़ी ना नुकर के बाद प्रवीण मान गया और उसने भी अपना नाम प्रतियोगियों में लिखवा दिया । मैंने कहा प्रवीण 15 दिन है तुम्हारे हाथ में आज से ही तैयारी शुरू कर दो।

सभी प्रतियोगी अपने अपने खेलों की तैयारियों में लगे थे । काळू भी खूब दौड़ लगा रहा था और प्रवीण भी ।

आखिर प्रतिस्पृद्धा वाला दिन आ ही गया । प्रतियोगिता स्थल पर पुरा गांव इकठ्ठा हो चूका था । लंबी कूद, ऊँची कूद, कबड्डी, भाला फेंक जैसी प्रतियोगिताएँ चल रही थी लेकिन सब कोई उत्सुक थे 500 मीटर की दौड़ देखने के लिए ।

तभी घोषणा हुयी कि अब 500 मीटर की दौड़ शुरू होगी । सभी प्रतियोगी अपना अपना स्थान लें । दर्शकों में भी जबरदस्त उत्साह छा गया । दौड़ शुरू हुयी और जैसा की अपेक्षित था, काळू कुछ ही समय में सबसे आगे था, प्रवीण ने भी शायद काफी मेहनत की थी वो काळू से थोडा ही पीछे दूसरे नंबर पर था । बाकि प्रतियोगी तो बहुत पीछे छूट चुके थे ।

तक़रीबन 400 मीटर की दुरी तय हो चुकी थी, स्तिथि अब भी वही थी, काळू लक्ष्य के काफी करीब था लोग प्रतीक्षा कर रहे थे काळू कब निर्धारित रेखा पार करे, तभी अचानक ये क्या? काळू उस रेखा से करीब 50 कदम पहले लड़खड़ा कर गिर पड़ा । वो जब तक संभल कर वापस खड़ा होता, प्रवीण जो उस से थोडा ही पीछे था, उस रेखा को छु चूका था ।

प्रवीण ने प्रतियोगिता जीत ली थी ।  लेकिन उसने ये हकार पुरस्कार लेने से ना कर दी कि काळू भैया गिर गए थे, अन्यथा वो ही विजेता होते, इसलिए इस पुरस्कार पर उनका ही हक़ है।

लेकिन काळू ने कहा की प्रवीण मैं अपनी गलती से गिरा था, मुझे तुमने तो नहीं गिराया था ना अतः इस पुरस्कार के सिर्फ तुम ही हकदार हो, तुम भी लगभग मेरे बराबर ही दौड़ रहे थे । इसलिए गर्व के साथ ये पुरस्कार तुम स्वीकार करो ।

प्रवीण ने उस पुरस्कार की राशि की सहायता से अपनी माता की चिकित्सा करवाई । उसकी माँ आज स्वस्थ है और प्रवीण का पूरा परिवार भी । प्रवीण पढ़लिख कर सौभाग्य से शहर की एक किसी प्रतिष्टित कंपनी में काम लग गया और उसको अच्छी तनख्वाह मिल रही है ।

गाँव वाले आज भी काळू की हार को पचा नहीं पा रहे हैं, क्योंकि वो वह नहीं जानते जो मैं जानता हूँ कि उस दिन काळू लड़खड़ा कर नहीं बल्कि जान बूझकर गिरा था। काफी पूछने पर काळू ने मुझे किसी को ना बताने की शर्त के साथ ये बात बताई थी ।

लेकिन काळू के त्याग की ये बात आज मैं आपके साथ बाँट रहा हूँ, काळू से किया अपना वादा तोड़ कर ।

काळू के बहुत से किस्से हैं जो एक ही बार में समेटना मुश्किल है अतः समय समय पर काळू के किस्से आप सब से कहता रहूँगा ।

आज के लिए विदा दीजिये । कल फिर मिलेंगे ।

जय हिन्द
....शिव शर्मा की कलम से...



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