Saturday, 16 January 2016

इश्क का बुखार - Ishq Ka Bukhar

इश्क का बुखार - Ishq Ka Bukhar


इसने उसको देखा, उसने इसको देखा
चेहरे पे मुस्कान आ गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई

दिलों में जज्बात उबलने लगे
पहनावे के तरीके बदलने लगे
छुप छुप के फूलों के बगीचों में
मिलने के दौर चलने लगे
अतरंगी अँखियों में
सतरंगी सपने पलने लगे
माशुका का चेहरा
चन्दा हो गया
सपनों का राजकुमार
वो बन्दा हो गया
दिन का चैन खोने लगा
रातों की नींद गुम गई
प्यार की आंधी सब कुछ उड़ा गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई

प्यार परवान चढ़ गया
वो भी घरवालों से लड़ गया
जाति दूसरी है तो क्या
धर्म तो एक है
ऊपर से उसका परिवार भी नेक है
आप बात तो चलाओ
उनके घर जाओ, या उन्हें बुलाओ
पर मेरी शादी
उसी लड़की से करवाओ
मैं उसके बिना जी ना सकुंगा
जहर जिंदगी का पी न सकुंगा
बातों में भी फ़िल्मी अदा आ गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई

घरवाले परेशान
कि अब क्या करें
बिरादरी का सोचें
या छोरे का ब्याह करें
इकलौता लड़का है
कहीं हाथ से ना निकल जाए
एक बार ऊंच नीच समझाते हैं
शायद उसकी आँखें खुल जाए
वो बड़े घर की बेटी है
उनके अलग रीति रिवाज है
बेटा तू हमारा कल है
तू ही आज है
मां बाप ने विचार करके
लड़के को समझाया
बहलाया, फुसलाया
परंतु उस प्रेम पुजारी को
ना समझना था, ना समझ आया
बोला, प्रेम किया है
उसी को अपनी दुल्हन बनाऊंगा
आप अगर ना माने
तो ताउम्र कुंवारा रह जाऊंगा
सदियों पुरानी धमकी काम आ गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई



मरता क्या ना करता की तर्ज पर
प्रिय पुत्र की अर्ज पर
लड़के के पिता
लड़की के पिता से मिले
बातों के सिलसिले चले
अनगिनत सवाल जवाब हुए
मगर नतीजे सही निकले
दोनों परिवारों की
सहमति हो गई
कल तक जो प्रेमिका थी
आज उसकी श्रीमती हो गई
दृश्य बदला प्रेयसि पत्नी बन के आ गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई

प्यार की मोमबत्ती जल गई
प्रेमी को प्रेमिका मिल गई
ऐसा तो अक्सर फिल्मो में होता था
प्रेमिका के लिए हीरो
कई गुंडों को धोता था
यहां तो बापू मिनिटों में मान गए
पुत्र की हृदयचाह जान गए
मनपसंद मन का मीत मिल गया
जैसे जीवन का संगीत मिल गया
पतझङ ऋतू भी फूल खिला गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई


इसके बाद की कथा
सब जानते हैं
प्रेम विवाह के अंजाम को
बखूबी पहचानते है
प्रेम विवाह में अक्सर ये होता है
कथित प्रेमी सर पकड़ के रोता है
साल दो साल सब ठीक चलता है
फिर इसको वो खलती है
उसको ये खलता है
जब उसकी कमाई से
प्रेमिका बीवी का
खर्च नहीं चलता है
प्रेमी पति बेचारा
सह भी नहीं सकता
खुद ही चुन कर लाया था
इसलिए किसी से कुछ
कह भी नहीं सकता
इश्क का बुखार उतर रहा है
उदासी के आलम में
दांतों से
नाखून कुतर रहा है
अक्सर खुद को कोसता रहता है
गुमसुम गुमसुम सोचता रहता है
अबला समझा था, मगर बला आ गई
ना जाने किस घड़ी, ये मुझको भा गई...............

Click here to read "सर्दी आई सर्दी आई " by Sri Shiv Sharma

सभी अंतर्जातीय या स्वजातीय प्रेम विवाह किये मित्रों से क्षमायाचना सहित ।

....शिव शर्मा की कलम से....


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