Tuesday, 16 February 2016

Immandari Ka Inam - ईमानदारी का इनाम


ईमानदारी का इनाम

आनंद युं तो अपनी नोकरी में खुश था । पढ़ा लिखा था और मुम्बई में एक कंपनी में काम करता था ।  तनख्वाह ज्यादा तो नहीं थी मगर उस से उसका गुजारा अच्छी तरह हो जाता था । घर खर्च निकाल के थोड़े बहुत पैसे वो भविष्य के लिए बचा भी लेता था ।

लेकिन वो रकम उन जरूरतों के लिए बहुत कम थी जो उसे निकट भविष्य में पूरी करनी थी । वो अपने परिवार के लिए कुछ अच्छा करना चाहता था । अभी की कमाई से घर खर्च तो चल जाता था लेकिन बहुत सी इच्छाएं मन में दबी की दबी रह जाती ।

परिवार के सदस्य भी जानते थे कि आनंद पर बहुत सी जिम्मेदारियों का बोझ है इसलिए वे भी उस पर अपनी कोई इच्छाएं थोपते नहीं थे ।

रोज की तरह आज भी वो काम पर जाने के लिए घर से निकला । मुख्य रास्ते पर आकर स्टेशन जाने के लिए सामने से आते हुए ऑटो रिक्शे को हाथ देकर रुकवाया और उसमें बैठ गया ।

रिक्शा में पहले से एक साहब बैठे थे जो काफी जल्दी में लग रहे थे, तभी तो उन्होंने रिक्शे वाले से कहा भैया मुझे थोड़ी जल्दी है, आप एक सवारी का अतिरिक्त भाड़ा मुझसे ले लेना लेकिन अभी आप कहीं रुकना मत । सीधे स्टेशन से कुछ पहले जो होटल है वहीँ रोकना ।

"इतनी जल्दी थी तो अपनी गाड़ी से आते।" रिक्शा वाले ने ताना मारा ।

"आ तो जाता भैया, लेकिन दुर्भाग्यवश गाड़ी आज ही ख़राब होनी थी ।" उन साहब ने जवाब दिया तो रिक्शे वाला निरुत्तर हो गया । वैसे भी पहनावे से वो कोई रसूखदार आदमी ही लग रहे थे ।

उनका गंतव्य आ गया तो जल्दी से उन्होंने रिक्शे का किराया दिया और  रिक्शे से उतर गए ।

स्टेशन आ गया तो आनंद ने भी रिक्शे में बैठे बैठे ही किराया दिया और जैसे ही उतरने लगा उसकी नजर पड़ी सीट पर गिरे बटुवे पर, जो काफी भरा भरा लग रहा था । शायद उन भाईसाहब का था जो जल्दबाजी में वहां गिर गया था ।

आनंद ने तुरंत मन ही मन कुछ सोचा और वो बटुवा उठा लिया । उसकी ट्रेन का समय भी हो गया था । लेकिन फिर भी उसने पहले उस काम को तवज्जो दी जो उस बटुवे की वजह से आन पड़ा था ।

उसने बटुवे में मिले कार्ड पर मोबाइल नंबर देखकर फ़ोन बूथ से उन साहब को फ़ोन लगाया ।

"हैलो कौन ।"

"जी मेरा नाम आनंद है, अभी अभी आप जिस रिक्शे से आये थे मैं भी उसी में था ।" आनंद ने जवाब दिया और आगे कहा "जल्दीबाजी में आपका बटुवा रिक्शे में गिर गया था, आप बताएं अभी आप कहां पर है, मैं आ के दे देता हुं ।"

"ओह हां श्रीमान, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।" उस व्यक्ति ने कहा और आनंद को जगह बताई जहां आनंद शीघ्र ही पहुँच गया । स्टेशन से थोड़ी दूरी पर ही तो थी ।

उन साहब ने आनंद को शाबाशी दी और पीठ थपथपाई । फिर पूछा "आपने देखा नहीं इस बटुवे में कितनी रकम थी । आप चाहते तो इसे अपने पास रख सकते थे"

"जी नहीं, जब ये मेरी है ही नहीं तो मैं क्यों देखता । हां इतना तो युं ही पता चल रहा है की काफी है । और हां अगर मैं इसे रख लेता तो शायद जीवन भर अपने आप को माफ़ नहीं कर पाता । क्योंकि ये भी एक तरह की चोरी होती और मैं चोरी नहीं कर सकता"

"धन्यवाद आनंद जी, आज के जमाने में आप जैसे ईमानदार कम ही मिलते हैं, क्या काम करते हैं आप?"

"जी कपड़ा बाज़ार में राज इंडस्ट्रीज नामक एक कंपनी में अकाउंटेंट हुं ।"

"अच्छा, शाम को आप मेरे घर पर आना आपसे थोड़ी और बातें करनी है, अभी तो थोड़ी जल्दी में हुं, अंदर मीटिंग में था, आपका फ़ोन आया तो मीटिंग बीच में छोड़कर बाहर आया, आपका एक बार पुनः धन्यवाद ।" कहते हुए उन्होंने अपना विजिटिंग कार्ड आनंद को दिया ।

"जी जरूर, अगर समय पर आ गया तो जरूर आऊंगा" आनंद ने उन से हाथ मिलाया और वहां से निकला ।

दफ्तर में जब सबको इस बात का पता चला तो सबने और उसके बॉस ने भी उसकी भूरि भूरि प्रशंशा की । बॉस ने वो विजिटिंग कार्ड लेकर नाम देखा तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान सी आ गयी थी, ऐसे लगा जैसे वो नाम उनका जाना पहचाना नाम था । फिर सब अपने अपने काम पर लग गए ।

शाम को घर जाने से घंटे भर पहले उसके बॉस ने उसे बुलाया और कहा "आनंद मैं तुम्हारे काम और ईमानदारी से बहुत खुश हुं, आगे भी जहां रहो ऐसे ही मेहनत और लगन से काम करते रहना, बहुत तरक्की करना । मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ है ।"

बॉस की बात सुन कर वो आश्चर्य चकित हो गया और पूछा "सर मुझसे कोई गलती हो गयी क्या, आगे भी जहां रहो, मतलब? मैं कहां जा रहा हुं यहाँ से ।"

"अरे नहीं आनंद, चिंतित मत होओ, अब तुम घर जाओ । तुम बता रहे थे उन साहब ने तुम्हें मिलने भी बुलाया है । उनसे मिलो वे क्या बोलते हैं ।" बॉस ने मुस्कुराते हुए कहा ।

घर आकर तरोताजा होने के पश्चात् वो जब उन साहब से मिलने गया तो उसे बॉस की सारी बातें समझ में आ गयी ।



उन साहब का चेन्नई में इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का कारोबार था और खाड़ी देशों में वो निर्यात किया करते थे ।उन्होंने उसे बताया कि उसका बॉस राज इंडस्ट्रीज का मालिक उनका भतीजा था और उन से उन्होंने आनंद के बारे में सारी पूछताछ कर ली थी ।

उन्होंने आगे बताया कि जिस वक्त वो उनका बटुवा वापस करने गया था उस वक्त उनकी मीटिंग दुबई के एक बड़े व्यापारी, जो कि उनके एक ग्राहक थे, के साथ चल रही थी और उस व्यापारी ने जब ये सुना तो वो बहुत प्रभावित हुए और तुरंत उन्होंने आनंद को अपनी ऑफिस में दुबई भेजने के लिए उन साहब से बात की ।

उन साहब ने आनंद को कहा कि आप पर कोई दबाव नहीं है अगर आप जाना चाहें तो ही जाएं । लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय ये है की आपको एक मौका मिला है, इसे हाथ से ना जाने दें । आपको वहां सब सुविधाओं के साथ यहां से बहुत ज्यादा तनख्वाह भी मिलेगी, इसके आलावा मेरे ये व्यापारी बहुत अच्छे इंसान के साथ साथ आदमी की क़द्र करने वाले शख्स भी है । आपके बॉस से भी मैंने इजाजत ले ली है ।

आनंद ने थोड़ी देर सोचकर हां कर दी तो उन्होंने वहीँ से अपने व्यापारी से फ़ोन पर बात की और आनंद को अगले दिन पासपोर्ट के साथ उसी होटल में आने को कहा ।

थोड़ा चाय नाश्ता करने के बाद आनंद जब वहां से निकला तो कई तरह के सपने उसकी आँखों में तैर रहे थे जो कि उसे लग रहा था की बहुत जल्दी पुरे होने वाले हैं । क्या संयोग था इतने बड़े आदमी का शेयर रिक्शे में आना, उसको वही रिक्शा मिलना, बटुवा इत्यादि ।

आनंद को लगने लगा कि शायद ईश्वर ने उसकी सुन ली । अपनी ईमानदारी का उसे बहुत शानदार इनाम मिला था ।

Click here to read "बेटियां - Daughters"  written by Sri Shiv Sharma

जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***



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