Monday, 16 November 2015

अंतिम पड़ाव - Antim Padav

अंतिम पड़ाव -  Antim Padav

The Last Stop

फ़ोन की घंटी बजी तो मेरी नींद टूट गयी । समय देखा, सुबह के साढ़े छह बज रहे थे । इतनी सुबह किसका फ़ोन होगा ? आशंका के साथ मैंने फ़ोन उठाया, सामाजिक कार्यों में अग्रणी मेरे परिचित कृष्णजी का फ़ोन था ।

मेरे हैलो के जवाब में उन्होंने कहा "क्षमा कीजियेगा, लेकिन जरुरी सुचना थी इसलिए आपको इतनी सुबह नींद से जगाया, अपने परम मित्र जाँगिड़ जी के दादाजी का स्वर्गवास हो गया है, सुबह 9 बजे ले के जाएंगे ।"

कृष्णजी द्वारा कहे गए शब्द "ले के जायेंगे" से ही सब कुछ समझ में आ गया था । "ठीक है, मैं आता हुं" कहकर मैंने फ़ोन काट दिया ।


अंतिम पड़ाव


जांगिड़ जी के दादाजी काफी समय से बीमार चल रहे थे । कल ही मैं उनसे मिल के भी आया था । कल तो उनको बोलने में भी काफी असुविधा हो रही थी । अभी कुछ वर्षों पहले दहाड़ने वाले दादाजी आज शांत हो गए थे ।

खैर जैसी कि जीवन की सच्चाई है, पंचतत्वों से बना शरीर आखिर उन्ही तत्वों में विलीन हो जाना है । जांगिड़ के दादाजी को भी मुखाग्नि दे दी गयी थी । सुखी लकड़ियां धू धू कर जल रही थी । अंतिम यात्रा में आये लोग इधर उधर होके बातों में मशगूल हो गए थे । मैं भी कृष्ण जी के साथ एक कोने में बैठकर बात करने लगा । विषय सब का एक ही था, जीवन का अंतिम सच, मृत्यु । सभी लोग वैरागी से हो गए थे । यही तो है श्मशान वैराग्य ।

आदमी कुछ पलों के लिए एकदम साधू बन जाता है । दुनियादारी फिजूल और भगवतभक्ति ही जीवन का असली सार लगने लगती है । सही भी है, मगर ये वैराग सिर्फ कुछ पलों का ही होता है । जैसे ही श्मशान से बाहर आते हैं, बाहर बनी दुकानों से सिगरेट, गुटखा ले कर अपनी नशापूर्ति करते हुए दादाजी को और मसान के अंदर हुयी बातों को भूल भाल जाते हैं । आजकल तो मोबाइल का ज़माना है सो कई लोग माल की डिलिवरी की व्यवस्था तो कुछ लोग शेयरों के सौदे कर डालते हैं ।


अंतिम पड़ाव


हालांकि ये भी जरुरी है, क्योंकि जो चला गया वो तो गया । लेकिन जो हैं उनके आगे तो पूरा जीवन पड़ा है । और जीने के लिए माया तो चाहिए ही । आखिर सैंकड़ो तरह की जरूरतें है जिंदगी की ।

लेकिन ये मन भी कितना बावरा है । अभी कुछ पल पहले जो वैराग धारण कर चूका था वो अचानक से पटरी बदल कर दूसरे ट्रैक पर आ गया । फिर वही कौन कितना गया गुजरा है वाली ख़बरें एक दूसरे को बांटना शुरू हो जाती है । मैं तो अच्छा हुं लेकिन फलां फलां आदमी आजकल बहुत अकड़ में रहता है, उसको कैसे निचे दिखायें वाली तिकड़म बाजी चलने लगती है । अचानक अगर वही व्यक्ति, जिसकी नैया डुबोने की बात चल रही थी, सामने आ जाये तो फिर ऐसे मिलेंगे जैसे उनसे ज्यादा परम हितैषी उसका और कोई नहीं होगा ।

फिर घर आकर नहा धो कर वापस हम फंस जाते है रंग बिरंगी दुनिया के जाल में । जहां खुद को आगे ले जाने के लिए अन्य कई लोगों का इस्तेमाल करना पड़ता है । उनको सीढ़ी बनाकर जीवन की नयी नयी ऊंचाइयां छूने के लिए ।

कहते हैं हर बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, वैसा ही कुछ जीवन रूपी सागर में भी चलता रहता है । कुछ लोग कुछ कमजोर और मजबूर लोगों की मजबूरीयों का भरपूर फायदा उठाते हैं ।


अंतिम पड़ाव


उन्ही मजबूरों में से ढूंढ ढूंढ कर कुछ गिरोह संचालक और आतंकवादी संगठन भी उन मजबूरों को अपने दल में शामिल कर लेते हैं और उनसे कई तरह के गैर क़ानूनी और मानवता को घायल करने वाले काम करवाते हैं । और फिर एक दिन वो मजबूर आदमी मारा जाता है एक गुमनाम और बदनाम मौत । जिसका उस संगठन पर कोई असर नहीं पड़ता ।

लेकिन हर ताकतवर, हर बड़ा आदमी ये भूल जाता है की एक दिन उसे भी जीवन त्यागना है । मृत्यु निश्चित आनी है, और चिता की आग ये नहीं देखती की उस पर लेटा आदमी बादशाह है या फ़क़ीर । वो सबका एक ही हश्र करती है । महाभारत के समय में यक्ष ने भी युधिष्टिर से पूछा था कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? तो महाराज युधिष्टिर ने जवाब दिया था कि आदमी रोजाना संसार में मृत्यु के उदहारण देखता है, फिर भी अपनी मृत्यु के बारे में कभी नहीं सोचता । ये ही संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है ।

सही भी है, इस सच्चाई को भूलकर सब तेरा मेरा, अपना पराया के चक्कर में लगे रहते हैं और जीवन गुजर जाता है । जीवन के अंतिम पड़ाव में प्रायः सबको अफ़सोस होता है कि उन्होंने जीवन को जिया नहीं, बस गुजारा है । उन्हें लगता है की वो कई भले और अच्छे काम कर सकते थे, मगर बाद में देखेंगे के फेर में कर नहीं पाये, और जीवन छोटा पड़ गया । काश....कुछ साल और जिंदगी मिल जाती ।

कल फिर मिलने के वादे के साथ आज अपने शब्दों को यहीं विराम दूंगा ।


अंतिम पड़ाव

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जय हिन्द

...शिव शर्मा की कलम से...








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