Thursday, 26 November 2015

और मुम्बई रो पड़ी - Aur Mumbai ro padi

और मुम्बई रो पड़ी - Aur Mumbai ro padi


आज से ठीक सात वर्ष पहले आज ही के दिन दहशतगर्दो ने मुम्बई को खून के आंसू रुलाया था । हमेशा भागती रहने वाली मुम्बई नगरी थम सी गयी थी । लगभग तीन दिनों तक पूरी मुम्बई सहमी हुयी सी थी ।

समुद्री रास्ते से करीबन दस आतंकी आधुनिक हथियारों से लेस पड़ोसी मुल्क की धरती से आये थे । छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर जिन्होंने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर कितनी मासूम जानें ली थी । कितने घर उजाड़ डाले थे ।

शाम के समय लोग अपना काम ख़त्म कर घर जाने की तैयारी कर रहे थे । कितनी माएं अपने बेटे की प्रतीक्षा कर रही होगी । किसी पत्नी ने अपने पति का मनपसंद खाना बना कर रखा होगा । कोई मम्मी अपने बच्चे की चिंता में ऑफिस से जल्दी निकली होगी । कोई बेटा सुबह आते समय अपने बीमार बाप के लिए दवा लाने का कह के आया होगा ।

चंद ही पलों में सारे वादे, सारी प्रतिक्षाएं धरी रह गयी थी । मौत के सौदागर बन के आये उन मानवता के दुश्मनों के हाथों, जिन्हें अपने आकाओं का आदेश था कि जो सामने आये बस मार डालो ।


मौत का ये खुनी नंगा नाच सिर्फ इस रेलवे स्टेशन पर ही नहीं हो रहा था । यहां से कुछ दूर एक केफे में भी इनके अन्य साथी निर्दोषों पर गोलियां बरस रहे थे । दस के दस आतंकी अलग अलग जगहों पर मौत का तांडव कर रहे थे जिनमे प्रमुख शिवाजी टर्मिनस, नरीमन हाउस और ताज होटल थे । इस खुनी तांडव में कुल मिलकर 160 से ज्यादा देशी विदेशी बेगुनाह मारे गए थे ।

उन तीन दिनों में इस हमले ने आम नागरिकों के अलावा कुछ पुलिस कर्मियों की भी बली ली थी । श्री हेमंत करकरे, श्री अशोक मारूति राव काम्टे, श्री विजय सालस्कर, श्री अरूण चिट्टे समेत कुल 17 पुलिस कर्मी शहीद हुए थे ।

इन देशभक्त जांबाजों ने जो किया उसको चंद शब्दों में बांधना मुश्किल है । उनको तो श्रद्धा और सम्मान के साथ नमन करता हूँ जिनके लिए उस दिन पूरी मुम्बई रो पड़ी थी ।

एकमात्र जिंदा पकड़े गए आतंकवादी कसाब के बयानों के अनुसार इस हमले का तानाबाना सीमापार पाकिस्तान की जमीन पर बुना गया था, लेकिन उसी पाकिस्तान ने बाद में मारे गए आतंकियों की लाशों को, लेना तो दूर, पहचानने से इनकार कर दिया था । कसाब को भी 21 नवम्बर 2012 को उसके गुनाहों की सजा के तौर पर फाँसी के फंदे पर झुलना पड़ा था ।

अभी कुछ दिन पूर्व पेरिस में भी मुम्बई की तरह का ही हमला हुआ । यहां भी सैंकड़ो निरपराध लोगों की जान गयी थी ।

समझ में नहीं आता कि आखिर चाहते क्या है ये आतंकवादी । इनका लक्ष्य क्या है । क्या यही कि जो भी सामने आये उसे मार डालो । क्या मिलता है इन्हें बेगुनाहों का खून बहाकर ?

जरा सोचिये, क्या बीतती होगी उस माँ के दिल पर, जिसका बेटा अपनी शादी की खरीददारी करने बाजार जाता है और इन गोलियों का शिकार हो कर वापस ही नहीं आ पाता । वो बहन तो ताउम्र अपने आपको कोसती रहेगी जिसने भैया को जिद्द करके अपने लिए आइसक्रीम लेने भेजा होगा ।

उस बाप का क्या जिसने अपने जवान होते बेटे को देखकर भविष्य के लिए ना जाने क्या क्या सपने देखे होंगे । उफ्फ.... । सोच कर ही मस्तिष्क एक अनजाने ख़ौफ़ से दहल जाता है ।

1993 के बम धमाकों, उसके बाद हुए लोकल ट्रेन विस्फोटों का दर्द झेल रही मुम्बई पर हुए उस 26 नवम्बर के हमले की भी आज सातवीं बरसी आ गयी । मुम्बई अपने जख्मों पर मरहम पट्टी भले ही कर चुकी है, लेकिन घाव अभी भरे नहीं है ।

जैसा कि मुम्बई के बारे में प्रसिद्द है कि मुम्बई कभी नहीं थमती, चलती ही रहती है । इस हादसे को भी अपने सीने में दफ़न कर मुम्बई ने अपनी रफ़्तार वापस पकड़ ली थी । लेकिन इस हमले का दिया हुआ दर्द एक लंबे समय तक पीड़ा तो देता ही रहेगा ।

उधर पड़ोसी देश को सैंकड़ो प्रमाण देने के बावजूद इस खुनी खेल की व्यूहरचना रचने वाले अभी भी वहां बैठे दावतें कर रहे हैं, और मुम्बई सिसक रही है न्याय की तलाश में । पता नहीं ये तलाश कब पूरी होगी । पता नहीं अपनी मुम्बई को कब इंसाफ मिलेगा ।

मुम्बई के जज्बे को सलाम ।

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...शिव शर्मा की कलम से...


















1 comment:

  1. 💐💐💐💐
    26/11 मुम्बई हमले में अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर शहीदों को अश्रुपूरित सादर श्रद्धांजलि ।

    हम आपको अपने अंतःकरण से नमन करते हैं । 🙏🙏
    💐💐

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