Monday, 23 November 2015

बारात का आनंद - Baraat ka Anand

बारात का आनंद - Baraat ka Anand


"भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को
हे मानस के राजहंस तुम भूल ना जाना आने को"

पढ़ते पढ़ते चम्पकजी की के चेहरे पर चमक आ गयी और आँखों से ख़ुशी के दो अश्रु टपक पड़े । कितने दिन हो गए थे, किसी बारात में गए हुए ।

बार बार उन्होंने उस मनुहार पत्रिका पर तारीख और समय देख कर याद कर लिया । हळद हाथ, बान या पाणिग्रहण संस्कार के समयों से जैसे उन्हें कोई मतलब ही नहीं था ।

"बारात ठीक तीन बजे अतिथि भवन से बस द्वारा अजमेर के लिए रवाना होगी ।" पढ़कर चम्पक जी ने मन ही मन निर्णय ले लिया था की मैं तो दो बजे ही पहुँच जाऊंगा । बस में खिड़की वाली सीट रोक कर बैठूंगा ।

तीन दिन बाकि थे । चम्पक जी ने बारात में जाने की तैयारी अभी से शुरू करदी । खुद अपने हाथों से बारात और ढूकाव में पहनने वाले कपड़े धो के इस्री कर लिए ।

चम्पकजी खाने के बड़े शौकीन थे और शादियों में बरातियों को तो तरह तरह के पकवान खाने को मिलते हैं इस वजह से बारात का नाम सुनकर ही उनका लहू उबाल मारने लगता था ।

उस दिन वो दो की बजाय एक बजे ही अतिथि भवन पहुँच गए । हालांकि अभी तक तो बस भी नहीं आई थी । मेजबान अपने कामों में लगे थे । चम्पकजी भी एक कुर्सी पर विराजमान हो गए । वे सबसे पहले पहुंचने वाले बाराती बन गए थे ।



करीब अढ़ाई बजे बारात में जाने वाले अन्य मेहमान आने शुरू हुए । किसी ने बताया की बस भी कुछ देर में पहुंचने वाली है । सुनकर चंपकजी के कानों में जैसे मधुर स्वरलहरी बज उठी ।

आखिर ठीक तीन बजे बस आई । तब तक प्रायः सारे बाराती भी आ चुके थे । चम्पकजी तो इसी हसीन वक्त के इंतजार में थे, भागकर बस में चढ़े और आगे वाली खिड़की के पास वाली सीट पर जा के बैठ गए ।

धीरे धीरे बस लगभग पूरी भर गयी । पीछे की दो चार सीट अभी भी खाली थी । साढ़े तीन बज चुके थे, चम्पकजी बेचैन हो रहे थे की कब ये अजमेर के लिए रवाना होगी । कुछ देर बाद दूल्हे के दादाजी आये और ड्राईवर को चलने के लिए बोला और चम्पकजी को आगे की सीट पर बैठे देख कर कहा "अरे चम्पक, इस सीट पर मत बैठ, खाली कर दे इसको । ये सीट देवी देवताओं की है ।"

चम्पकजी तो हक्काबक्का हो गए पर बाकि बरातियों ने भी जब दादाजी की हाँ में हाँ मिलाई तो मजबूरन उन्हें पीछे वाली सीट पर आकर बैठना पड़ा जहां खिड़की वाली सीट तो बच्चों ने पहले से कब्ज़ा रखी थी । फिर तो पुरे रास्ते चंपकजी पिछली सीट पर उछलते गिरते से अजमेर पहुंचे ।

आते ही उन्होंने अपनी उछलन भरी यात्रा को भुलाकर बारात ठहराव स्थल का जायजा लिया । नाई कहाँ बैठा है । बूट पॉलिश वाला किस कोने में है । फिर जमकर नाश्ता उड़ाने के बाद उन्होंने अपने जूतों की पोलिश करवाई और बनी हुयी दाढ़ी को फिर से बनवाया । आखिर बाराती जो थे ।

तब तक ढुकाव का समय हो चूका था । बैंड वाले "ओ पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े" की धुन बजा रहे थे । विश्राम स्थल से ढुकाव निकला, दूल्हे के भाई और कुछ दोस्त बिना नाचने वाली धुन पर भी आड़ा टेढ़ा नाच नाच रहे थे । लेकिन चंपकजी का मन तो खाने की स्टाल के सपने देख रहा था ।

विवाह स्थल तक लगभग एक घंटे बाद बारात पहुंची । बाराती अंदर विवाह भवन में आ गए । चंपकजी भी । वरमाला का कार्यक्रम चल रहा था तब बाकि सब लोग सूखे मेवों का आनंद उठा रहे थे ।

खाने के स्टॉल पीछे शामियाने में लगे हैं, चम्पकजी के लिए अति महत्वपूर्ण ये जानकारी अभी अभी, पीछे वाली कुर्सी पर बैठे सज्जन जब अपने साथी को बता रहे थे, तब मिली । फिर तो चंपकजी धीरे से खड़े हुए और अपनी बेल्ट और पेंट को दुरुश्त करने के बाद निकल पड़े अपने चहेते पड़ाव की तरफ ।

बाप रे बाप ! इतने सारे तरह तरह के स्टाल ...... देखकर चंपकजी चकरा गए । लेकिन उनको तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गयी थी । खूब छक कर उन्होंने पानी पूरी, आलू चाट, डोसे, जलेबियों, और अन्य व्यंजनों का लुत्फ़ उठाया । पेट गले तक भर चूका था लेकिन मन नहीं भरा ।

रात को बारह एक बजे बस वापस जायेगी । ये बात आते वक्त ही दूल्हे के दादाजी बता चुके थे और इस वक्त साढ़े बारह बज रही थी । चंपकजी भी अन्य बारातियो के साथ बस में बैठ चुके थे । इस बार उन्हें उनकी मनपसंद सीट भी मिल गयी थी ।

अगली सुबह चंपक जी दवा की दूकान पर दिखाई दिए । उनके हाथ में हाजमोला की एक शीशी और दस्त रोकने वाली दवा देखकर मैनें युं ही पूछ लिया, "क्या चम्पकजी, फिर कोई बारात में गए थे क्या?" 😊

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...शिव शर्मा की कलम से...







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धन्यवाद

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2 comments:

  1. Sharmaji, Maja aayo, laga hai ki mai ek baraat jaake aaya

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  2. चाट पकौड़ियाँ भी खाई की नहीं । ☺

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