Tuesday, 3 November 2015

वर्माजी की साइकिल - The bicycle of Verma Ji




वर्माजी की साइकिल - (Vermaji ki Cycle) - The bicycle of Verma Ji


खट्ट खट्ट खटाक खट्ट खट्ट खटाक की जानी पहचानी ध्वनि जब गली से सुनाई पड़ी तो हम समझ गए कि वर्माजी आ गए हैं ।

करीब 55-56 वर्षीय वर्माजी शांत स्वभाव के व्यक्ति थे और गाँव के विद्यालय में हिंदी के अध्यापक थे । चार साल पहले उत्तर प्रदेश से यहाँ आये थे, अकेले । गली के एक मकान में एक कमरा उन्होंने किराए पर ले लिया था ।

उनके पास वर्षों पुरानी, या ये कहें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए की सदियों पुरानी, एक साईकिल थी । जो वो अन्य रोजमर्रा के सामान के साथ अपने साथ ले के आये थे ।

आप लोगों ने भी गौर किया होगा कि कुछ लोगों के पास कुछ न कुछ ऐसा होता है जो "ऐतिहासिक" होता है । उस चीज को देखें तो लगता है जैसे अस्पताल के बिस्तर पर आखिरी साँसे गिनता कोई मरीज हो, पता नहीं कब दम तोड़ दे । और तो और धीरे धीरे वो "एंटीक पदार्थ"  पुरे गाँव में प्रसिद्द हो जाता है ।

वर्माजी की साईकिल भी ऐसी ही प्रसिद्धि प्राप्त वस्तु थी, जो हर दस पंद्रह दिनों में मरम्मत की मोहताज रहती थी । मगर वर्माजी को पता नहीं उससे क्या लगाव था की उसे छोड़ते ही नहीं थे । गाँव के उनके हमउम्र लोगों ने कई बार उनसे कहा था कि मास्टरजी अब तो बेच दो ये साइकिल, अभी तो अपना छोटू साईकिल वाला इसके 100-50 रुपये देने को भी तैयार है । बाद में आपको सामने से देने पड़ जाएंगे, सोच लीजिये ।

वर्माजी सिर्फ हंसकर इतना ही कहते थे, भैया अभी तो ये और आराम से 4-5 साल साथ देगी । फिर तो मेरे खुद के घुटने भी जवाब दे देंगे तो इसकी आवश्यकता ही नहीं रहेगी ।

बच्चे भी अक्सर उनकी साईकिल की मजाक उड़ाते रहते थे । "गुरूजी, आपकी साईकिल चाहिए कल, पास वाले गाँव जा के आना है।" वर्माजी सिर्फ मुस्कुरा देते थे । कभी कभी बच्चों को डांट भी देते थे ।

एक बार वर्माजी की साईकिल फिर से ख़राब हो गई । छोटू के पास वो उसे मरम्मत के लिए ले के गए तो छोटू भी कहने लगा, "मास्टरजी आपकी साईकिल पर आप कितना खर्च कर चुके हो कभी पता किया आपने, अगर नई साइकिल लेते तो भी उस खर्चे से कम में आ जाती"।

वर्माजी ने इतना ही कहा "छोटू, खर्च तो किश्तों में हो रहा है, नई लेने जाएंगे तो पैसे भी तो एक साथ देने पड़ेंगे ना। तू इसी को दुरुश्त करदे भैया।"

हर तीन चार महीने में पांच सात दिन के लिए वर्माजी अपने घर जाया करते थे। अपने परिवारजनों से मिलने । अभी भी छुट्टियां थी स्कूल की तो वर्माजी अपने गाँव गए हुए थे ।

परंतु गाँव से आने के बाद जब स्कूल से आये थे तो कुछ बुझे बुझे से नजर आ रहे थे । पता चला कि उनकी साईकिल किसी ने चुरा ली थी । अपने गाँव जाते वक्त हमेशा की तरह वो उसे स्कूल के साईकिल स्टैंड में ही ताला लगाकर छोड़ गए थे ।

पिछले हफ्ते स्कूल भी छुट्टियों की वजह से बंद था उसी दौरान साईकिल गायब हो गयी थी । सबने उन्हें समझाया, "मास्टरजी जाने दो, पुरानी साईकिल थी, आप उसे छोड़ ही नहीं रहे थे, लगता है चोर उस साइकिल की हालत से अनजान था, भला हो उस चोर का जिसने आपको उस खटारा से निजात दिलवाई।"

लेकिन ये क्या.........?

मास्टर जी की आँखों में आंसू थे । उनकी भीगी आँखे देख के सब के सब चुप हो गए । कुछ देर की चुप्पी के बाद एक बुजुर्ग ने उनसे पूछा। "क्या बात है मास्टरजी, हम क्षमा चाहते है अगर अनजाने में आपका दिल दुखाया हो तो, वैसे अब कुछ कुछ तो हम समझ पा रहे हैं कि उस साईकिल में कुछ तो ऐसा था, कोई तो ऐसी बात थी, जो आप हम सबसे छुपा रहे हैं । आज बता दीजिये, आपका उस साईकिल से इतना लगाव क्यों था जो चोरी होने पर आपकी आँखों में आंसू तक भर आये"।

मास्टरजी ने चश्मा उतारकर अपनी आँखे पोंछी और जो बताया सुनकर हम सब अवाक् रह गए थे ।

उन्होंने बताया की वो साईकिल उनके बेटे की थी । आज से बारह तेरह साल पहले जब वो 19 साल का था तो उसके जन्मदिन पर मास्टरजी ने वह साईकिल उसे तोहफे स्वरुप दी थी । एक दिन उस साइकिल पर जब वो अपनी कॉलेज जा रहा था तो एक मोड़ पर किसी वाहन ने दायें बाजू से उसे टक्कर मार दी । टक्कर इतनी जबरदस्त थी की वो वहीँ गिर पड़ा और.......।  कहते कहते मास्टरजी काफी भावुक हो उठे थे ।

गाँव में ये बात किसी को पता नहीं थी कि एक हंसमुख चेहरे के पीछे इतना दर्द छुपा है । वो साइकिल उनके लिए महज एक साइकिल नहीं थी, उनके बेटे की यादें थी । शायद उस साइकिल के पास रहने से उन्हें अपने बेटे के स्पर्श का आभाष हुआ करता था ।

छह महीने बाद वर्माजी स्कूल से सेवानिवृत हो गए थे । उनको विदा करते वक्त गाँव के हर व्यक्ति की आँखे नम थी । शाम को गाड़ी में जब उनका सामान जा रहा था तो उनके अपने सामान के साथ साथ गाँव वालों द्वारा दिए गए तोहफे भी थे । बस....... वो साइकिल नहीं थी ।

यादें.. - Memories


...शिव शर्मा की कलम से...





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