Monday, 30 November 2015

मेला - Mela, Funfair


मेला - Mela, Funfair


उस वक्त मैं प्राइमरी स्कूल में पढ़ा करता था । घर से थोड़ी दूर ही हमारी स्कूल थी जहां हम मोहल्ले के काफी बच्चे पढ़ने जाया करते थे । आधी छुट्टी में स्कूल के पास बने बगीचे में हम झूला झूलने जाया करते थे । कभी कभी, पैसे होते तो, स्कूल के बाहर खड़े ठेले से कोई चाट पकौड़ी खा लेते ।

उस दिन स्कूल में थोड़ी जल्दी छुट्टी हो गयी थी । आज गांव में मेला लगने वाला था, गणगौर तीज का मेला । राजस्थान में गणगौर का ये उत्सव चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है । गणगौर के रूप में माँ पार्वती और ईशर के रूप में भगवान शंकर की पूजा की जाती है ।

नवविवाहिताएं अपने पति का उम्र भर का साथ यानि अखंड सुहाग पाने को और कुंवारी लड़कियां इच्छित वर पाने के लिए ईशर गणगौर की पूजा और व्रत करती है ।

नवविवाहिताएं अपनी पूजी हुयी गणगौर का चैत्र शुक्ल तृतीया को सांयकाल नदी, तालाब या सरोवर में विसर्जन करती है । गौर माता को विदा करने हेतु पूरा गांव तालाब किनारे इकठ्ठा होता है, और फिर मेले का रूप ले लेता है ।

राजस्थान की राजधानी, गुलाबी नगरी जयपुर में तो ये उत्सव इतनी धूमधाम से मनाया जाता है कि गणगौर की शाही सवारी देखने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ता है, जो जयपुर के राजपरिवार के यहां से निकलती है ।

अन्य गांवों की तरह हमारे गांव में भी इस दिन मेला लगता है जहां तरह तरह के हिंडोले, झूले, मिठाई नमकीन की अस्थाई दुकानें, खिलौनों की दुकानें इत्यादि बड़े ही व्यवस्तिथ तरीके से सजे होते थे । आज वही मेला शाम को तालाब किनारे लगने वाला था ।

हम मोहल्ले के सभी दोस्त छुट्टी के पश्चात जब स्कूल से निकले तो घर आते वक्त उत्सुकतावश तालाब वाले रास्ते से ही आये । ये जांचने के लिए कि मेले की क्या तैयारियां चल रही है । लेकिन उस वक्त वहां ज्यादा चहल पहल नहीं थी । बस दुकानों के लिए तिरपाल की कनातें बाँधी जा रही थी ।

घर आकर जल्दी जल्दी कुछ खाना खाया । क्योंकि ध्यान तो पूरा शाम को लगने वाले मेले में लगा था । मेले में जाने के लिए थोड़ी बहुत मेला खर्ची भी तो चाहिए होती थी, जो मैं घर के सब बड़ो से "लाइए मेला खर्ची दीजिये" कह कर इकट्ठी करता ।

माँ, पिताजी, दादी, भैया, दीदी, मामा, नानी सब कुछ ना कुछ दे देते थे । कोई चवन्नी, कोई दस बीस पैसे तो कोई अठन्नी । कुल मिला कर दो सवा दो रुपये इकट्ठे हो जाया करते जो उस समय काफी होते थे ।

शाम को सब परिवार वालों के साथ मेला देखने निकल पड़ते । लेकिन जब हम चार पांच दोस्त इकठ्ठा हो जाते तो हमारी मंडली घर वालों से अलग हो जाया करती थी । फिर तो कभी कचोरी, शरबत, मलाई वाली कुल्फी का आनंद उठाते, कभी झूलों का । हवा में उड़ने वाले गैस का गुब्बारा, बांसुरी, पों पों वाला बाजा, झुनझुना इत्यादि उन दो सवा दो रुपये में ही कितनी खरीददारी, कितना मनोरंजन और खाना पीना हो जाया करता था ।

समय चक्र अपनी निश्चित गति से चलता रहता है । प्राइमरी से उच्च माध्यमिक स्कूल और फिर कॉलेज । कई मेले आते और चले जाते । आठवीं नवीं क्लास तक तो फिर भी बहुत से मेले देखे । उसके बाद मेलों में जाने का मौका कम ही मिलता था । कारण, मेले अक्सर परीक्षाओं के समय ही हुआ करते थे ।

पढ़ाई पूरी हुयी तो आगे के जीवन को सुगम बनाने का उद्देश्य लिए चला आया मुम्बई । यहां का दृश्य देख कर तो में अचंभित हो गया,  जहां देखो एक मेला सा ही दिखाई पड़ता है । हर तरफ लोगों की भीड़, कदम कदम पर हर वो वस्तुयें उपलब्ध है जो हम गांव में मेला होने पर ही देख या खरीद पाते थे ।

आज जेब में दो सवा दो रुपयों की जगह पांच सात सो रुपयों ने ले ली है ।  चाट पकौड़ी अब भी खाता हुं । मौका मिलने पर झूला भी झूलता हुं । लेकिन इस चाट पकौड़ी में वो स्वाद और झूले में वो आनंद नहीं मिलता जो गांव के मेले में मिला करता था ।

शायद आपको भी अपने गांव के मेले याद आते होंगे या अभी मेरे इस अनुभव को पढ़कर आये होंगे । आशा है आपके विचारों से आप मुझे जरूर अवगत कराएँगे ।

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जय हिन्द

...शिव शर्मा की कलम से...







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