Thursday, 22 September 2022

मन

 मन


नमस्कार मित्रों । मेरी पिछली रचना दर्द को आपने इतना पसंद किया, उसके लिए आप सभी का हृदय से आभार ।


आज आपके लिए एक गीत लेकर आया हूं मन । जैसा की हम सभी जानते है की हमारा मन हमारा होते हुए भी हम कभी नहीं जान पाते कि आखिर ये चाहता क्या है । पल पल बदलता जो रहता है, और तो और खुद को हर परिस्थिति के अनुसार ढाल भी लेता है ।


मन के रूप अनेकों है मगर आश्चर्य इस बात का है की संसार के हर प्राणी का अभिनेता मन अभिनय लगभग समान ही करता है ।


इसी चंचल मन पर कुछ पंक्तियों को मिला कर एक गीत बनाने का प्रयास किया है, आशा है आपको जरूर पसंद आएगा ।






मन


कभी कभी लगता है झूठा, कभी ये सच्चा लगता है,

मन तो मनमौजी है एक छोटा सा बच्चा लगता है,


बिन आंखों के स्वप्न देखता बिना कान सुन लेता है,

बिना पंख के उड़ते उड़ते ख्वाब कई बुन लेता है,

नहीं जरूरी मन का हर एक ख्वाब हकीकत बने मगर,

उन ख्वाबों का सच हो जाना, कितना अच्छा लगता है,

मन तो मनमौजी है एक छोटा सा बच्चा लगता है ।


अभी यहीं था अब ना जाने कौन दिशा में चला गया,

ठग कर आया कभी किसी को, कभी किसी से छला गया,

आवारा है या पागल है ये कोई ना समझ सका,

झूठे सपनों सा तो कभी दर्पण सा सच्चा लगता है,

मन तो मनमौजी है एक छोटा सा बच्चा लगता है ।


खुद हंस लेता खुद रो लेता खुद बातें कर लेता है

याद में खो कर किसी की उनसे खुद मुलाकातें कर लेता है,

टूट टूट कर जुड़ता रहता कोमल है, मजबूत भी है,

चट्टानों सा सख्त कभी मिट्टी सा कच्चा लगता है,

मन तो मनमौजी है एक छोटा सा बच्चा लगता है ।


ये हारा तो हार गए हम ये जीते तो जीत बने,

ये आपस में मिल जाए तो प्रीत का एक संगीत बने,

बहक भी जाता, वश में भी है, मन के रूप निराले शिव,

सब इसमें ढल जाते, ये जादू का संचा लगता है।

मन तो मनमौजी है एक छोटा सा बच्चा लगता है ।।


******


इन दो पंक्तियों के साथ अपनी ये रचना आपको समर्पित करता हूं ।


खुश होता है तो कभी उदास होता है,

ये मन है जनाब, बहुत खास होता है ।


एक नई रचना के साथ फिर से जल्दी ही मिलते हैं ।


दर्द



जय हिन्द


*शिव शर्मा की कलम से*



आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

धन्यवाद

Wednesday, 20 July 2022

दर्द

 
दर्द


नमस्कार दोस्तों, नन्ही परी कविता को आपने इतना पसंद किया उसके लिए आप सभी का हृदय से आभार।


आज आपके लिए एक गज़ल ले कर आया हूं "दर्द" । जैसा की शीर्षक से आपको आभाष हो गया होगा कि जिंदगी के दर्दों पर ही लिखी गई होगी ।


मुझे एक किस्सा याद आ रहा है कि एक बार इंसानों ने भगवान से शिकायत की कि आपने हमें गमों भरी जिंदगी दी है, कोई कहता कि मेरी जिंदगी में दर्द ज्यादा है और दूसरा कहता कि मेरी जिंदगी में जो दर्द है उनके आगे तुम्हारे गम कुछ भी नहीं है ।


तो भगवान ने कहा कि देखो तुम्हारी किस्मत पहले से लिख दी गई है, मैं अब उसमें कुछ बदलाव तो नहीं कर सकता पर हां अगर आप लोग चाहो तो अपने अपने गमों को आपस में बदल सकते हो । उसके लिए आप सब अपने अपने गम और दर्दों की एक पोटली बनाकर यहां रख दो एवं फिर जिसको जो पोटली चाहिए वो उसे उठा ले ।


सबने ऐसा ही किया, लेकिन आश्चर्य कि सबने अपनी अपनी पोटली ही वापस उठा ली थी, क्योंकि दुखी सब थे पर उनको उन पोटलियों में अपने गम ही सबसे कम लगे थे ।


इस कहानी का सार यही है कि संसार में हर कोई अपने सीने में अनेकों दर्दों को छुपाकर जी रहा है ।


परंतु कभी कभी इंसान ज्यादा घुटता है तो वो किसी को अपने जख्म दिखाना चाहता है, मगर उसे महसूस होता है कि ये तो खुद भी दर्द के साए में है ।


अंत में एक ही शख्स बचता है और वो है हमारा जीवनसाथी, जिसके साथ हम अपने सुख दुख बांट लेते है ।


इन्हीं कुछ पोटलियों को समेटकर ये ग़ज़ल "दर्द" लिखने का प्रयास किया है ।


आशा है अन्य रचनाओं की तरह आपको मेरी ये रचना भी पसंद आएगी । अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएं।




दर्द

अपने अपने दर्द है सब के, अपना दर्द बताऊं कैसे,

शायद कोई समझे ना समझे, मन की पीर सुनाऊं कैसे,


मां के साथ जिया ना बचपन, पापा भी तो नहीं रहे अब,

स्वर्ग के नंबर भी तो नहीं है, आखिर फोन लगाऊं कैसे,


भाई बहनों पर भी तो है अपनी अपनी जिम्मेदारी,

जब उनकी सरगम मैं खुद हूं, दर्द का नगमा गाऊं कैसे,


यार दोस्त भी बहुत व्यस्त है जीवन की इस भाग दौड़ में,

जो खुद ही जख्मी है उनको अपने जख्म दिखाऊं कैसे,


बच्चे सारे बड़े हो गए अपनी ही दुनिया में मगन है,

लेकिन मैं तनहा तनहा हूं, उनको ये बतलाऊं कैसे,


जीवनसाथी तुम ही हो जो, मन की बात समझ जाते हो,

सबसे छुपा लेता हूं लेकिन तुमसे दर्द छुपाऊं कैसे,


समझ नहीं आता मुझको कुछ, अब तुम ही समझा दो "शिव"

अपने हर जख्मों को खोल के, दिल अपना दिखलाऊं कैसे ।


अपना दर्द बताऊं कैसे, मन की पीर सुनाऊं कैसे,

दर्द का नगमा गाऊं कैसे, अपने जख्म दिखाऊं कैसे ।।


****


नन्ही परी


जल्दी ही फिर मिलते हैं एक नई रचना के साथ ।


जय हिन्द


*शिव शर्मा की कलम से*


आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

धन्यवाद




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Thursday, 14 July 2022

नन्ही परी

 

नन्ही परी


नमस्कार मित्रों, आज एक कविता ले कर आया हूं "नन्ही परी" ।


घर परिवार में जब कोई शिशु जन्म लेता है तो उस परिवार के आनंद और खुशी का कोई पारावार नहीं रहता, सबके चेहरे खुशी से खिल जाते हैं ।


मेरी और मेरे सारे परिवार की खुशी का भी कोई ठिकाना नहीं था जब "नन्ही परी" ढेरों खुशियां ले कर मेरे घर आई थी । ये कविता भी उन्ही आनंदित क्षणों में लिखी थी ।



मुझे लगता है की हमारे जीवन में ये क्षण हर एक के जीवन को आनंदित करते है, और ये भी हो सकता है कि मेरी ये कविता शायद सबके मन की बात हो । ये तो आप सबके कमेंट्स से ही पता चलेगा कि मैं सबके मन की बात को कहने में कितना सार्थक हुआ हूं, अतः कविता आपको कैसी लगी ये कमेंट करके जरूर बताएं ।


नन्ही परी


रोशन सारा मकां हो गया, हर कोना मुस्काया है,

मेरे घर के आंगन में, एक चांद उतर कर आया है,


जगवाले ने झोली भरदी,

बहुत बड़ा उपकार किया

की रहमत ऊपर वाले ने,

प्यारा सा उपहार दिया

इसके रूप में हमने एक अनमोल खजाना पाया है,

मेरे घर के आंगन में एक चांद उतर कर आया है,


प्यारे प्यारे नयन झरोखे,

कोमल नन्हे हाथ है इसके,

चेहरे पर है नूर अनोखा,

जैसे ईश्वर साथ है इसके,

इसके तेज के आगे देखो सूरज भी शरमाया है,

मेरे घर के आंगन में एक चांद उतर कर आया है,


दादा दादी नाना नानी,

चाचा और ताऊ ताई

और इसके पापा के संग,

मम्मी भी कितनी मुस्काई

सब कोई भीतर तक खुश है परिवार में आनंद छाया है,

मेरे घर के आंगन में एक चांद उतर कर आया है,


खुशबूदार हवाएं हो गयी,

बादल नभ पर झूम रहे हैं,

चम चम करते तारे सितारे,

इसके मुख को चूम रहे हैं,

राग फिजाओं ने छेड़ी है मीठा नगमा गाया है,

मेरे घर के आंगन में एक चांद उतर कर आया है ।।


आशा करता हूं कविता आपको पसंद आई होगी, यदि हां तो अपने मित्रों, परिजनों के साथ भी इसे साझा (शेयर) करें ।


ना जाने क्यूं


बहुत जल्द फिर मिलते है एक नई रचना के साथ ।


*शिव शर्मा की कलम से*


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Tuesday, 1 February 2022

ना जाने क्यूं

 ना जाने क्यूं 

Photo by Felipe Cespedes from Pexels


नमस्कार मित्रों । सर्वप्रथम तो आप सभी को अंग्रेजी नववर्ष की शुभकामनाएं ।


आज आपके लिए एक छोटी सी कविता ले कर आया हुं, जो वास्तव में एक ऐसे पिता के एहसास है जो दूर अकेला परदेस में बैठा है और स्वाभाविक है कि अपनों से दूर होने का एहसास उसे काफी खलता है ।


इस कविता की प्रेरणा भी मुझे मेरे एक सहकर्मी की बदौलत ही मिली । हुआ यूं कि कुछ दिन पहले जब हम मिले तो उसके चेहरे पर उदासी की कुछ लकीरें साफ दिख रही थी । मैंने पूछा कि क्या बात है भाई, आज घर वालों से बात नहीं हुई क्या, कुछ उदास दिख रहे हो । उसने दिखावटी मुस्कान के साथ कहा, भाई बस "घरवाली" से ही बात होती है, बाकि "घरवालों" को फुरसत ही कहाँ है बात करने को । कभी कभी मेरा जी चाहता है कि बच्चे भी मुझसे बात करे, मगर...... खैर छोड़ो, आप बताओ आप कैसे हो ।


शायद अनजाने में वो अपना दर्द बयां कर गया था लेकिन जब उसे लगा कि ये बात उसे नहीं करनी चाहिए थी तब वो औपचारिक बातों पर आ गया था । मगर मुझे लगा कि ये दर्द सिर्फ इसको ही नहीं और भी कई पिताओं को हो सकता है ।


तो इसी दर्द को एक कविता के रूप में दिखाने का प्रयास किया है । आशा है आप पसंद करेंगे और अगर ये कविता आपके दिल को छू जाए तो कृपया शेयर जरूर करें ।


ना जाने क्यूं

-------------------


वो सबकी सोचता है,

फिक्र करता है,

बात बात में

बच्चों का जिक्र करता है,


दूर परदेस में बैठा,

रोज पत्नी से,

उनके हाल पूछता है,

हर एक के लिए

बीसियों सवाल पूछता है,


रसोई में आज

क्या खास बनाया,

तुमने और बच्चों ने

क्या खाना खाया,


तुमने कहा था,

छोटे को थोड़ी हरारत सी है

डॉक्टर को दिखाया क्या,


बड़े की ऑफिस का कोई मसला था,

हल हुआ कि नहीं

कुछ बताया क्या,


बहु को जो कुर्ता पसंद था

वो उसे दिलाया क्या,

बेटी कल उदास क्यों थी

उसने बताया क्या,


पत्नी भी सब सवालों के

हंसकर जवाब दे देती है,

कहीं दुविधा हो

तो पति से राय ले लेती है,


परिवार की खुशियों के लिए

वक्त के हाथों मजबूर है,

बच्चों को कोई तकलीफ ना हो

इसलिए घर से दूर है,


ये विरह ये अकेलापन,

दोनों को खलता है,

पर बच्चों के लिए

दूर रहना भी चलता है,


और बच्चे.....

खुद में ही मस्त है,

कुछ काम हो या ना हो

फिर भी व्यस्त है,


अपनी ही दुनिया में मशगूल है,

शायद उनकी नजर में,

औपचारिकतायें फिजूल है,


बात करने की भी फुरसत नहीं,

हो सकता है,

शायद उन्हें लगता हो,

इसकी कोई जरूरत नहीं,


फिर भी ना जाने क्यूं

रोज उसे उम्मीद रहती है,

हर उगते सूरज के साथ

आशाएं जगती है,


ना जाने क्यूं,

उसके सपने भी ऐसे है,

कि आज

कोई पूछेगा उसको

पापा..... आप कैसे है ।।

**     **     **


परदेसी बाबू


जल्दी ही फिर मिलते हैं एक नई रचना के साथ ।

*शिव शर्मा की कलम से*







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Wednesday, 27 January 2021

परदेसी बाबू

 परदेसी बाबू


नमस्कार दोस्तों । आज आपके लिए एक कविता लेकर आया हूँ जो कविता कम और मेरे निजी अनुभव ज्यादा है ।


अभी करीब दो महीने की छुट्टी पर मैं घर आया था जो कि चुटकियों में बीत गए थे । लगा ही नहीं कि मैं दो महीनों से देश में था । वापस आते वक्त लगा कि काश...... कुछ दिन और यहां रहता...... तो शायद काफी सारी इच्छायें और पूरी कर लेता ।


ऐसा नहीं है कि ये कोई पहली बार था, हर बार जब भी वापस आने का समय होता है तो सदैव ऐसे ही लगता है कि काश...... कुछ दिन और....।


और मैं जानता हूं कि ये अनुभव सिर्फ मेरा ही नहीं है, ये हर उस व्यक्ति के मन के भाव है जो अपने गांव, अपने देश और अपनों से दूर रहता है ।


मेरी और उन सभी परदेसी बाबुओं की भावनाओं को समेटकर इस छोटी सी कविता की माला में पिरोने का एक प्रयास किया है । आशा करता हूं कि आप इसे जरूर पसंद करेंगे ।


परदेसी बाबू


मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह रीत जाते हैं,

दिन कितनी जल्दी बीत जाते है,


दो महीने जैसे कुछ ही पलों में बह गए,

कितने सारे काम, आधे अधूरे से रह गए,


लगता है जैसे कल ही तो घर आया था,

अभी तो सारे दोस्तों से मिल भी ना पाया था,


अभी तो घर पर चैन से बैठा भी ना था,

अभी तो नजर भर ठीक से बच्चों को देखा भी ना था,


अभी तो वाकिफ भी ना हुआ था, गांव की हवाओं से,

अभी तो खेला भी ना था, पेड़ों से, लताओं से,


मन भर के माँ के हाथों की बनी रोटी भी ना खाई थी,

अभी बहनों से राखी भी कहाँ बंधवाई थी,


पापा और भैया से, कितना कुछ कहना छूट गया था,

वापसी की टिकट देख, अंदर तक कुछ टूट गया था,


नन्ही परी घर आई थी, उसे दुलार भी ना पाया था,

उसके साथ खेलने का आनंद कहाँ उठाया था,


पत्नी के दिल की बातें तो दिल ही में रह गयी थी,

विदा होते वक्त ये बात, उसकी भरी आंखें कह गयी थी,


दिल था कि मान ही नहीं रहा था,

"वापस जल्दी आना पापा", बच्चों ने कहा था,


शायद सब चाहते थे, कि मैं यहीं पर रहूं,

कुछ उनकी सुनूं, कुछ अपनी कहुं,


पर क्या करें, हर एक की मजबूरी है

जीवन की जरूरतें पूरा करना भी जरूरी है,


परदेश नहीं जाऊंगा, तो सपने अधूरे रह जाएंगे

हंसी खुशी के ये कुछ पल भी, कमियों में बह जाएंगे,


छोटी छोटी चीजों के लिए तरसना ना पड़े,

टूटते सपने देख आंखों को बरसना ना पड़े,


तभी तो अपनों को छोड़ के परदेसी होना पड़ता है

कहते हैं, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है,


गलत है ये कहावत, क्योंकि घुट घुट रोना पड़ता है,

कुछ पाने के लिए कुछ नहीं, "बहुत कुछ" खोना पड़ता है ।।


***  **  **  **


अभी विदा चाहूंगा दोस्तों, जल्दी ही फिर मिलने के लिए । आपके कमेंट्स का इंतज़ार करूंगा ।


पता ही ना चला


जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*


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Thursday, 3 December 2020

पता ही ना चला

 पता ही ना चला


नमस्कार मित्रों । आपके लिए फिर एक बार एक छोटी सी ग़ज़ल ले कर आया हुं "पता ही ना चला" ।
आशा है हर बार की तरह इस बार भी आप मेरी इस नई रचना को अपना भरपूर स्नेह देंगे ।




पता ही ना चला


आसमान पे बादल छा गए, पता ही ना चला,

सितारे जमीं जगमगा गए, पता ही ना चला,


ना धूप देखी, ना कभी चांदनी में नहाए,

सब मौके गंवा गए, पता ही ना चला,


हकीमों ने सलाह दी, खुराक कम करो,

हजारों गम खा गए, पता ही ना चला,


यूं तो पीते थे हम, महज शौक की खातिर

जाम से बोतल पे आ गए, पता ही ना चला,


नजर मिली, तो दबा के दांतों में पल्लू,

वो क्यों शरमा गए, पता ही ना चला,


अब ना बहाएंगे आंख से आंसू, सोचा था,

गुजरे पल रुला गए, पता ही ना चला,


भरोसा था जिन पर, खुद से भी ज्यादा,

खेत ही बाड़ खा गए, पता ही ना चला,


मिले थे "शिव", जो कभी ना बिछड़ने को,

कब हाथ छुड़ा गए, पता ही ना चला ।।


* * * * * * * *


जल्दी ही फिर मिलते है एक नई रचना के साथ । आप सब अपना और अपनों का खयाल रखें । सतर्क रहें, सुरक्षित रहें, स्वस्थ रहें ।


 सिंहनी


जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*


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Monday, 2 November 2020

सिंहनी

 सिंहनी


नमस्कार मित्रों । इस बार एक ग़ज़ल ले के आया हुं, बिना किसी भूमिका के आपके सामने पेश कर रहा हुं । आपके कमेंट्स का इंतजार रहेगा ।


सिंहनी


अब तू डरना छोड़ दे बेटी

तूफां का रुख मोड़ दे बेटी,


धनुष उठा प्रत्यंचा चढ़ा और

बाण अग्नि का छोड़ दे बेटी,


चुन चुन बुरी नजर वालों का

मुगदर से मुंह तोड़ दे बेटी,


गिद्ध दृष्टि जो तुझ पर डाले

उन आंखों को फोड़ दे बेटी,


गाहे बगाहे हाथ लगाए

उंगलियां उसकी मोड़ दे बेटी,


बदनीयती से तुझको छुए

ऐसे हाथ मरोड़ दे बेटी,


पल्लू तेरा जो खींचना चाहे

सजा उसे उसी ठौड़ दे बेटी,


बन बैठे है दुःशासन जो

उनका लहू निचोड़ दे बेटी,


खुद तू ही बन जा केशव और

आँचल खुद ही जोड़ दे बेटी,


कृष्ण नहीं आ पाएंगे अब

तू ही सुदर्शन छोड़ दे बेटी,


लाज शर्म से खाली हो गए

सोए हृदय झंझोड़ दे बेटी,


मदद करे बेटी की जो "शिव"

उनको दुआ करोड़ दे बेटी ।।


*   *   *   *   *


जल्दी ही फिर मुलाकात होगी । इस ग़ज़ल के बारे में अपनी राय अवश्य बताएं ।


ख्वाब


जय हिंद


*शिव शर्मा की कलम से*


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Thursday, 30 July 2020

ख्वाब

ख्वाब

नमस्कार मित्रों । आज आपके लिए एक छोटा सा गीत लेकर आया हुं । आशा है मेरी अन्य रचनाओं की तरह इसे भी आप अपना भरपूर स्नेह देंगे ।

"ख्वाब" हम सबके दिलों में पलते हैं और समय व परिस्थिति अनुसार बदलते भी रहते है । कुछ पूरे होते है कुछ अधूरे भी रह जाते है, पर हम सदैव उन्हें पूरा करने की कोशिश करते हैं और करनी भी चाहिए, क्या पता अगली कोशिश में ही हम अपनी मंजिल को छू लें ।

इसी विषय को लेकर ये गीत लिखा है । मुझे पूरा यकीन है कि आपको अवश्य पसंद आएगा । अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें और गीत अच्छा लगे तो अपने मित्रों के साथ साझा भी करें ।

ख्वाब

नजर ना लग जाये इनको
इसलिए छुपाकर रखे है,
दुनिया से बचाकर लाया हूं
दुनिया से बचाकर रखे है,
दिल के किसी कोने में कुछ
कुछ यादों की तस्वीरों में,
इन आंखों की छत पर मैंने
कुछ ख्वाब सजाकर रखे हैं ।

कुछ नरम मुलायम नाजुक है
कुछ अनदेखे अनजाने से,
कुछ अल्हड़ है कुछ गुमसुम से
कुछ लगते बहुत पुराने से,
जैसे भी है मेरे है इन्हें
मैनें अपना बनाकर रखे है,
इन आंखों की छत पर मैंने
कुछ ख्वाब सजाकर रखे हैं ।

कुछ ख्वाब जहन में बाकि है
कुछ ख्वाब अभी भी अधूरे है,
बस एक जुनून यही दिल में
करना इन सबको पूरे है,
रब जानता है सब पर मैनें
सब उसे बताकर रखे हैं,
इन आंखों की छत पर मैंने
कुछ ख्वाब सजाकर रखे हैं ।

कुछ खट्टे है कुछ मीठे भी
और कुछ उनमें रसदार भी है,
जो भरे हुए है भावों से
उनमें से झलकता प्यार भी है,
मीठे खाबों को चुन चुन कर
सीने से लगाकर रखे है,
कड़वे खट्टे को इन सबसे
कुछ दूर हटाकर रखे हैं,
इन आंखों की छत पर मैंने
कुछ ख्वाब सजाकर रखे हैं ।।




******

जल्दी ही फिर मिलते है दोस्तों एक नई रचना के साथ । तब तक के लिए नमस्कार । अपना ख्याल रखें, स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों का पालन करें और सुरक्षित रहें ।

जय हिंद



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*शिव शर्मा की कलम से*


Monday, 13 July 2020

हौले हौले


हौले हौले



नमस्कार मित्रों । कैसे हैं आप सब ? आशा करता हुं कि आप सब स्वस्थ और सुरक्षित हैं । मुश्किलों के इस दौर में अपना और सबका ध्यान रखें ।



आज आपके लिए एक ग़ज़ल ले के आया हुं "हौले हौले", यानि धीरे धीरे, जिसकी प्रेरणा भी अकस्मात ही मिल गई । हम तीन चार जने यूं ही कुछ चर्चा कर रहे थे और बातों बातों में किसी ने कहा कि आखिर इस महामारी का अंत कब होगा ? तो दूसरे ने कहा सब कुछ सही हो जाएगा हौले हौले । और वाकई हौले हौले सब सही हो भी जाता है तो मैंने भी हौले से ये शब्द चुना और हौले हौले लिख डाली ये ग़ज़ल "हौले हौले" । आशा करता हूँ कि पूर्व की भांति इस बार भी आप इस ग़ज़ल को भी खूब पसंद करेंगे ।

हौले हौले

जब से कोई, बदल गया हौले हौले,
दिल सीने से, निकल गया हौले हौले

आया तो था कोई, बहलाने इस दिल को,
फिर बड़े करीब से, निकल गया हौले हौले

दर्द तो होना ही था, मायूसियाँ भी बढ़ी,
मैं फिर भी, संभल गया हौले हौले

वक्त की ठोकरों ने सख्त बना दिया जिसे,
पत्थर वो भी, पिघल गया हौले हौले

बड़े जोश में निकला था अकड़कर,
सूरज शाम को, ढल गया हौले हौले

चिढ़ाता रहा अंधेरा कुछ देर तो मगर,
जादू चांद का, चल गया हौले हौले

दिल तो बच्चा है, अब "शिव" भी क्या करे
फिर किसी को देख, मचल गया हौले हौले ।।

****

शब्द भाग ३




बहुत जल्द फिर आपसे मिलता हुं, तब तक के लिए नमस्कार । अपना ध्यान रखें, घर पर रहें, सुरक्षित रहें ।

जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*









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Saturday, 21 December 2019

शब्द भाग ३



शब्द भाग ३


नमस्कार मित्रों । "शब्द" आप इतना पसंद कर रहे हैं उसके लिए आप सभी का आभार । लीजिये पेश है शब्द भाग ३, इसी आशा के साथ कि इसे भी आप भाग १ और २ की तरह अपना अपार स्नेह प्रदान करेंगे ।

शब्द भाग ३

इसीलिए जब भी कुछ बोलो
सोचो समझो शब्दों को तोलो
पहले सोचो अर्थ अनर्थ की
पीछे फिर अपना मुंह खोलो ।।२२।।

शब्द तुम्हारी है परछाई
अच्छे बुरे ये दो है भाई
एक शब्द साजन बन जाता
दूजा बन जाता हरजाई ।।२३।।

शब्द जुड़े और गीत बन गए
जीवन का संगीत बन गए
ढाई अक्षर बोल प्रेम के
कितने मन के मीत बन गए ।।२४।।

शब्दों की माया अलबेली
मानव से करते अठखेली
प्राण कभी तन से ये निकाले
उफ्फ, कहीं पर जान ही ले ली ।२५।।

शब्दों का संसार अनोखा
मानव जीवन का है झरोखा
कहीं शब्द से बिगड़ी बनती
कहीं शब्द दे देते धोखा ।।२६।।

शब्द बड़े ही जादूगर है
खेलने वाले बाजीगर है
कब किस वक्त पे क्या हम बोले
शब्द बनाते हमें चतुर है ।।२७।।

शब्द शांति भी ले आते है
मन में भ्रांति भी ले आते हैं
अगर कोई सेनानी बोले
शब्द क्रांति भी ले आते हैं ।।२८।।

बोस सुभाष के कुछ शब्दों ने
स्वतंत्रता की अलख जगा दी
खून के बदले आजादी की
नेताजी ने शर्त लगा दी ।।२९।।

आजादी के दीवानों पर
उन शब्दों ने असर दिखाया
एक एक से हुए हजारों
जोश नजर हर एक में आया ।।३०।।

हिन्द फ़ौज बन गयी अनूठी
अंग्रेजों की किस्मत फूटी
जयहिंद का घोष सुना तो
फिरंगियों की हिम्मत टूटी ।।३१।।

पंद्रह अगस्त सन सैंतालीस में
भारत ने आज़ादी पाई,
साहस और हौसले के संग
शब्दों ने ताकत दिखलाई ।।३२।।

रघुकुल में भी शब्द जाल ने
एक कथा ऐसी रच डाली
एक दासी के बहकावे ने
कैकई की बुद्धि हर डाली ।।३३।।

राम की लीला थी अति न्यारी
त्रेता युग के थे अवतारी
कौशल्या के लाल लाडले
जिन्हें पूजती दुनिया सारी ।।३४।।

माताओं की आंख के तारे
दशरथ के वे राजदुलारे
भरत लखन और शत्रुघ्न को
लगते थे अग्रज वे प्यारे ।।३५।।

दशरथ ने ये मुनादी कराई
राम बनेंगे अवध के राजा
होने लगा नगर में उत्सव
बाजे ढोल नगाड़ा बाजा ।।३६।।

अवधपुरी के प्रजाजनों में
राम ही राम थे सबके मनों में
लेकिन कुछ शब्दों के कारण
बदल गया था दृश्य क्षणों में ।।३७।।

कुटिल मन्थरा के शब्दों ने
कैकई को मतिभ्रम कर डाला
रानी ने महाराज से मांगा
राम की खातिर देश निकाला ।।३८।।

कुछ शब्दों के जाल ने कैसा
रघुकुल में भी विष फैलाया
अनुनय विनय करे दशरथ पर
एक शब्द भी काम ना आया ।।३९।।

पूरी लीला को समेटकर
शब्द शब्द शब्दों से जोड़कर
तुलसीदास जी ने लिख डाली
रामायण की गाथा सुंदर ।।४०।।

सूंदर सुंदर शब्द सजे जब
तो रचनाएं बन जाती है
एक शब्द जो जुड़े शब्द से
मधुर कथाएं बन जाती है ।।४१।।

आओ हम भी करें प्रतिज्ञा
कटु शब्द ना अब बोलेंगे
मीठी बोली से हर दिल में
मधुर सरस अमृत घोलेंगे ।।४२।।

क्रोधावेश में भी कुछ रुककर
बोलें भी तो सोच समझकर
क्योंकि शब्द बना सकते हैं
स्नेह भरी धरती भी बंजर ।।४३।।

प्रेम की बोली सबसे प्यारी
मीठी मीठी न्यारी न्यारी
आओ हम भी मधुर वाणी से
चलो जीत लें दुनिया सारी ।४४।।

जय हिंद

"शब्द" के तीनों भाग आपको पसंद आये होंगे । जो मित्र किसी कारणवश भाग 1 या भाग 2 नहीं पढ़ पाए तो इसी पेज पर उनका लिंक दिया हुआ है, लिंक पर क्लिक करके आप उन्हें पढ़ सकते हैं ।

जल्दी ही फिर मिलेंगे मित्रों एक नई रचना के साथ । तब तक के लिए नमस्ते ।

*शिव शर्मा की कलम से*



शब्द भाग २



आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

धन्यवाद


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Thursday, 21 November 2019

शब्द - भाग २



शब्द भाग २


नमस्कार मित्रों, शब्द का पहला भाग आपने इतना पसंद किया उसके लिए आप सभी का आभार ।

आपकी आतुरता को आदर देते हुए आज ले आया हुँ शब्द का दूसरा भाग । आशा है इसे भी आप भाग १ की तरह ही अपना स्नेहाशीष देंगे, और अपने अन्य मित्रों को भी इसका लिंक, पहले की तरह, अग्रसर (फॉरवर्ड) करेंगे ।

आज के भाग में रानी द्रोपदी द्वारा दुर्योधन को कहे गए शब्दों के कारण हुए महाभारत युद्ध के कुछ दृश्य दिखाने का प्रयास है, अब मैं कहां तक इस प्रयास में सफल हुआ हूं ये तो आपके कमेंट्स द्वारा ही पता चलेगा। तो लीजिये, शब्द भाग २ आपके लिए ।

शब्द भाग २


अर्जुन कर्ण का वध क्यों करता
भीम प्रतिज्ञा किसलिए करता
झूठ युधिष्ठिर भी ना बोलता
भीष्म पितामह कभी ना मरता ।।८।।

अगर जरूरी नहीं बोलना
व्यर्थ क्यों मुख फिर अपना खोलना
चुप से मगर कोई बात जो बिगड़े
घोर पाप तब नहीं बोलना ।।९।।

अगर भीष्म तब चुप ना रहते
गुरु द्रोण कुछ शब्द जो कहते
महाभारत की कथा ना होती जो
द्युत क्रीड़ा चुपचाप ना सहते ।।१०।।

वहां जरूरी था कुछ कहना
बहुत गलत था तब चुप रहना
शब्द अगर उपयोग में लाते
कष्ट का पल ना पड़ता सहना ।।११।।

शकुनि के पांसे थे भारी
धर्मराज ने बाजी हारी
दुर्योधन ने जीत लिए थे
पांचाली संग भाई चारी ।।१२।।

दुर्योधन ने शब्द सुनाए
पांचाली को पकड़ ले आये
दुःशासन ने वस्त्र जो खिंचे
द्रोपदी को अब कौन बचाये ।।१३।।

पांचाली ने मन ही मन में
शब्द मदद को कुछ दोहराये
व्याकुल शब्द सुने गिरधर ने
लाज बचाने दौड़े आये ।।१४।।

परिस्थिति थी चुप रहने की
भीम में शक्ति कब सहने की
कड़ी प्रतिज्ञा कर डाली थी
दुशाशन का लहू पीने की ।।१५।।

कुछ शब्दों ने कर क्या डाला
भ्राताओं को लड़वा डाला
चाचाओं के हाथों एक
भतीजे को भी मरवा डाला ।।१६।।

विध्वंसक एक युद्ध हो गया
शरशय्या पर भीष्म सो गया
अभिमन्यु, गुरु द्रोण, दुशाशन
कर्ण ना जाने कहाँ खो गया ।।१७।।

अगर द्रोपदी चुप रह जाती
शब्दों को बाहर ना लाती
दुर्योधन की ईर्ष्या शायद
युद्ध का रूप नहीं ले पाती ।।१८।।

कुछ शब्दों ने और कुछ चुप ने
काम बिगाड़ा था तब सारा
गुरु शिष्य बन गए थे दुश्मन
भाई ने भाई को मारा ।।१९।।

माना था दुर्योधन दम्भी
कारण नहीं था युद्ध का फिर भी
पांचाली के उन शब्दों ने
आग में डाल दिया थोड़ा घी ।।२०।।

उन लपटों में हस्तिनापुर
जल उठा था फिर धु धु कर
रोज जली थी कई चिताएं
था दृश्य वो बड़ा भयंकर ।।२१।।

इसीलिए जब भी कुछ बोलो
सोचो समझो शब्दों को तोलो
पहले सोचो अर्थ अनर्थ की
पीछे फिर अपना मुंह खोलो ।।२२।।

शब्द भाग 1



** क्रमशः ***

अगले भाग में जल्दी ही आपके लिए ले के आऊंगा की ये छोटा सा शब्द "शब्द" और क्या क्या कर सकता है, क्या क्या अर्थ अनर्थ कर सकता है । तब तक के लिए विदा मित्रों ।

जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*










आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

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Wednesday, 13 November 2019

शब्द


शब्द


नमस्कार मित्रों । आशा है आप सब सकुशल और प्रसन्नचित्त होंगे ।

इस बार थोड़ा हटकर एक कविता लिखने का प्रयास कर रहा हुं, इस आशा के साथ कि ये अवश्य ही आपको पसंद आएगी और आप भी उसे आगे से आगे बढ़ाते (फॉरवर्ड करते) जाएंगे ताकि आपके अन्य मित्र भी इसे पढ़ सकें ।

एक छोटा सा शब्द है "शब्द", लेकिन हम कब, कहां और कैसे इन शब्दों का उपयोग करते है, वही शब्द हमारे व्यक्तित्व की परछाई बन जाते हैं ।

प्रेमवश जहां हम अच्छे और सुंदर शब्दों का प्रयोग करते हैं वहीं विपरीत परिस्थितियों में, क्रोधावेश में, हम ऐसे शब्दों का चयन कर बैठते हैं जो अर्थ का अनर्थ कर के जीवन में जहर घोल देते है ।

उदाहरणार्थ जैसे महाभारत काल में द्रोपदी इंद्रप्रस्थ में अगर दुर्योधन को वे "अंधे का पुत्र अंधा" जैसे व्यंग्यात्मक शब्द ना बोलती तो शायद महाभारत ना हुई होती । बहुत से हजारों वीर योद्धा असमय काल के गाल में ना समाते ।

ऐसे ही त्रेता युग में (भगवान राम के समय) रावण यदि अपने भाई विभीषण को कटु शब्द ना बोलता तथा विभीषण के शब्दों पर गौर करके माता सीता को ससम्मान श्री राम को सौंप देता तो आज शायद हर वर्ष रावण के पुतले ना जलते ।

मेरे कहने का अर्थ इतना सा है कि ये "शब्द" भले ही एक छोटा सा शब्द हो मगर ये अपने अंदर बहुत कुछ छुपाये हुए है । किस समय हम किन शब्दों का उपयोग करें ये हमारी सोच और बुद्धि पर निर्भर करता है । ये शब्द ही है जो लोगों के दिलों में आदर भी पैदा कर सकते हैं और दूरियां भी ।

अतः आप जब भी कुछ बोलें, सदैव सोच समझकर और तोल मोल कर बोलें, ताकि आप लोगों के दिलों में जगह बना सकें और उन के हृदय में आपके लिए सदैव सम्मान और आदर बना रहे ।

इस बार मैनें इसी "शब्द" को अपनी कविता का शीर्षक चुना है और मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इस कविता को भरपूर आशीर्वाद देंगे ।

तो लीजिये, अब ये कविता "शब्द" आपकी अदालत में पेश कर रहा हूँ । अपने विचारों से अवगत जरूर कराएं । अग्रिम धन्यवाद के साथ पेश है "शब्द" ।

शब्द  भाग १

शब्द बोलते, शब्द तोलते
शब्द दिलों का राज खोलते
शब्द ही परिभाषा बन जाते
शब्द कभी आशा बन जाते ।।१।।

शब्द नरम है शब्द गरम है
शब्द भी रखते लाज शर्म है
सोच समझ कर शब्द बोलना
शब्द है पूजा शब्द धर्म है ।।२।।

शब्द वही जो मन को भाये
मधुर शब्द सबको हर्षाये
कड़वा शब्द जहर है ऐसा
असर करे, रिश्ते मर जाये ।।३।।

शब्द ही मन का मैल मिटाते
शब्दों से चेहरे खिल जाते
शब्द बने कटु शब्द अगर तो
घर घर में झगड़े करवाते ।।४।।

शब्द कई घायल कर देते
शब्द हमें पागल कर देते
शब्द अगर हो अमृत जैसे
दुनिया को अपना कर लेते ।।५।।

हस्तिनापुर था शक्तिशाली
अभिमन्यु बालक बलशाली
युद्ध महाभारत ने कर डाली
वीरों से धरती ये खाली ।।६।।

पांचाली कुछ शब्द ना कहती
महाभारत की बात ना चलती
शकुनि के पांसे ना होते
लाक्षागृह की घटना ना घटती ।।७।।

अर्जुन कर्ण का वध क्यों करता
भीम प्रतिज्ञा किसलिए करता
झूठ युधिष्ठिर भी ना बोलता
भीष्म पितामह कभी ना मरता ।।८।।


खजाना



** क्रमशः ***

मित्रों क्षमा चाहूंगा, ये कविता जरा लम्बी होगी अतः इसे हम कुछ पार्ट में आपके सम्मुख पेश करेंगे । आपसे वादा है कि "शब्द भाग 2" बहुत शीघ्र ही आपके सामने होगा । मुझे पूरा विश्वास है कि थोड़ा सा वक्त तो आप देंगे ही ।

कुछ समय बाद फिर मिलते हैं, तब तक के लिए विदा दोस्तों ।

जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*










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Tuesday, 1 October 2019

खजाना


खजाना



नमस्कार दोस्तों । इस बार बहुत लंबे अर्से के बाद आपके रूबरू हो रहा हुं, लेकिन अब आप से थोड़े थोड़े अंतराल पर मुलाकात होती रहेगी ।

इस बार एक ग़ज़ल "खजाना" लेकर आया हुं और उम्मीद करता हुं कि आप इसे पसंद करेंगे ।

खजाना

जिंदगी में दर्द के पल भूल जाना चाहिए,
आदमी को बे वजह भी मुस्कुराना चाहिए,

क्या हुआ गर ख़ाब कुछ तेरे अधूरे रह गए,
जो हुए पूरे उन्ही में दिल लगाना चाहिए,

दूर है मंजिल तेरी और जिस्म में ताकत नहीं,
ऐसे बचकाने बहाने ना बनाना चाहिए,

कर लगन होकर मगन पहचान अपने लक्ष्य को,
और तान सीना ठान कदमों को बढ़ाना चाहिए,

दूसरों की कामयाबी पर जलन क्योंकर करें,
खुद को कुछ कर जाने के काबिल बनाना चाहिए,

मैं ही मैं हुं, सब मेरा है, मुझसे आगे कौन है,
इस तरह की सोच को तीली लगाना चाहिए,

राह हो मुश्किल मगर आसान करनी हो अगर,
मां बाप के चरणों में ये मस्तक झुकाना चाहिए,

रास्ते कांटों भरे और दूर मंजिल इसलिए,
साथ में उनकी दुआओं का खजाना चाहिए,

गर कोई मजबूर है, है जुल्म से दबा हुआ,
फायदा मजबूरियों का नहीं उठाना चाहिए,

जो कर सके कुछ तू अगर, तो कर मदद मजबूर की,
दे सहारा उनकी भी हिम्मत बढ़ाना चाहिए,

देखता है रब तुझे हर पल छुपी नजरों से शिव,
दाग से दामन सदा अपना बचाना चाहिए ।।

** ** ** ** ** **


मजदूर



जल्दी ही फिर मिलते है दोस्तों ।

जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*







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Wednesday, 30 January 2019

मजदूर



मजदूर


रविवार का दिन था और ठिठुराती हुई सुबह के उस वक्त लगभग आठ बज रहे थे । ठंड इतनी कि अगर खुला बदन हो तो रगों का खून जमा दे ।

इतने में बाहर से आवाज आती है....... दूध....... शायद बिरजू दूध लेकर आ गया, सर्दियों में आठ बजे तक आता है मगर गर्मी के मौसम में साढ़े छह का समय है इसका । बबलू की मम्मी रसोई में से बर्तन लेकर दूध लेती है ।

कई लोग तो अभी भी रजाइयों में दुबके पड़े हैं । जो उठ गए, वे आग के पास हाथ सेक कर इस सर्दी में नहाने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं । वाकई इस सर्दी में नहाना भी बहादुरी का ही काम है ।

तभी टपाक से घर के दरवाजे के ऊपर से उड़ता हुआ अखबार आकर गिरता है । जिसे उठाकर बबलू दादाजी को उनके कमरे में दे आता है । अब दादाजी रजाई में दुबके दुबके पूरा अखबार पढ़ डालेंगे ।

बाहर से साइकिल की घंटी की आवाज आती है, ये ब्रेड बिस्किट बेचने वाला मुन्ना है जो गली गली साइकिल पर घूम कर अपनी रोजी रोटी कमाता है ।

तभी एक और आवाज कानों में पड़ती है......
"सब्जी ले लो सब्जी ई ई ई.... ताजा सब्जी......"
माली काका आ गए ताजा सब्जियां ले के । आवाज और खुद दोनों कांप रहे है पर रोज इस समय वे हमारी गली में पहुंच ही जाते हैं ।




माली काका से सब्जियां खरीदने का काम पापा करते हैं, दोनों हमउम्र जो हैं, काम के साथ थोड़ा हंसी ठट्ठा भी कर लेते हैं ।

कोहरा थोड़ा सा छंट गया है, धूप की किरणें सर्दी की इस धुंध से जद्दोजहद कर रही है धरती तक आने के लिए । यूं लगता है जैसे इस ठंड ने सूर्यकिरणों को भी जमा दिया है ।

"अरे बहु, चाय तो पिला दो, बड़ी ठंड है आज तो" पापा ने रोज वाली बात आज फिर दोहरा दी । कहते हैं सर्दी में ये अदरक वाली चाय पीने का आनंद ही अलग है ।

"आपका काम हुआ नहीं क्या अभी तक, ज्यादा है तो मदद करूं ?" चाय के कप लिए पत्नी कमरे में आई, और हंसते हुए बोली ।

"नहीं हो गया, तुम तो बस गर्मा गरम चाय पिला दो" मैनें भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया और हम दोनों ने रोज की तरह साथ बैठ कर चाय पी ।

पिछले एक घंटे में मैनें दुकान का एक हफ्ते का हिसाब मिला लिया और खाता बही वापस यथास्थान रखी । आज रविवार था तो दुकान देरी से ही खोलनी थी ।

चाय पीकर मैं रजाई की गरमाहट का मोह छोड़कर बाहर आया । गली में इक्का दुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे । समय लगभग पौने नो हो गया था । धूप अभी भी निकलने को छटपटा रही थी, कोहरा उसकी राह में रोड़े डाल रहा था ।

गली के नुक्कड़ वाली सामने की ढलान से गोपाल आता दिखाई दिया । गोपाल बाजार में माल ढुलाई का काम करके अपना परिवार चलाता है ।

"भाईजी नमस्ते" वो पास आकर बोला ।



"नमस्ते भाई गोपाल, क्या बात है, इतनी सुबह सुबह कहां चल दिये इस सर्दी में । आज तो बाजार भी देर से और आधा ही खुलेगा ।" मैंने एक साथ उससे दो तीन सवाल कर डाले ।

"भाईजी, वो बंसल साब की गोदाम के बहुत से माल को उनकी दूसरी गोदाम में स्थानांतरित करना है इसलिए उन्होंने कल ही कह दिया था सुबह नो सवा नो बजे तक आने को ।" गोपाल ने बताया ।

"अच्छा, पर ये काम तो दोपहर में भी हो सकता था, इतनी सर्दी में तुमको दौड़ा दिया बंसल जी ने, वो भी रविवार को । थोड़ा अपना भी ध्यान रखो भाई ।"

"जी वो उनका कोई नया माल पहुंचने वाला है आज 12 बजे तक, इसलिए उन्होंने कल ही बोल दिया था, और मजदूरी भी ज्यादा देंगे ।"

रही बात सर्दी और रविवार की, तो एक मजदूर के लिए क्या सर्दी और क्या रविवार भाईजी । परिवार चलाने के लिए इन सबको नजरंदाज करना पड़ता है एक मजदूर को । अच्छा भाईजी, अब चलता हूं, देर हो रही है । नमस्ते ।"

एक ही सांस में गोपाल इतनी सारी बात कर गया, और मुझे सोचने पर मजबूर कर गया कि सच ही तो है, एक मजदूर के लिए मौसम या वार कोई मायने नहीं रखता । चाहे वो बिरजू हो, अखबार वाला राजू हो, मुन्ना हो या माली काका । अपनी सीमित कमाई में वे एक भी दिन कैसे व्यर्थ गवां सकते है । आखिर पेट का सवाल है ।

"ए माई...... कोई ठंडी बासी रोटी दे ए........... भूख लगी है" दो 12 तेरह साल के गरीब भिक्षुक भाई बहन पड़ोस वाले घर के दरवाजे पर उम्मीद से आवाज लगा रहे थे ।

** ** ** ** **

जल्दी ही फिर मिलते हैं दोस्तों । ये कहानी आपको कैसी लगी, जरूर बताना । और हां, सर्दी वाकई काफी है । अदरक वाली चाय पर विशेष ध्यान रखना ।


पहले तो तुम ऐसे ना थे


जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*











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Thursday, 27 December 2018

नन्ही कोंपल

नन्ही कोंपल



नमस्कार दोस्तों । आज एक कविता लेकर आया हुं जिसकी भूमिका मैं नहीं बताऊंगा । आप ही बताएं कि जब मैं ये कविता लिख रहा था तो नन्हीं कोंपल की आड़ में मेरे मस्तिष्क में क्या दृश्य रहा होगा । मैं आपके जवाब का इंतजार करूंगा ।


नन्ही कोंपल


समय ना रुका है ना रुकता है
ना थकता है, ना झुकता है

पीढियां आती है
चली जाती है
समय के साथ
कुछ नन्ही कोंपल
पौधा बन जाती है,

अपनी नई काया पर
इठलाती, इतराती, बलखाती
हवाओं से अटखेलियां करती
नन्ही नन्ही शाखाओं को
अपने आसपास लहराती

देखती है बड़े बड़े जर्जर पेड़
जो सुख चुके हैं अंदर से
हवाओं के तेज झोंके से
जो गिर सकते हैं कभी भी

वो कोंपल
उपहास उड़ाती है
उन बूढ़े पेड़ों का
ये भूलकर
कि उन्ही के साए में
वो पनप रही है
कोंपल से पौधा बन रही है

मगर वो मुरझाये हुए वृक्ष
मुस्कुराते हुए
आनंद उठाते है
कोंपल से पौधा बने
अपने उस नए सदस्य का

निहारते हैं उसकी सुंदरता
खुश होते है
देखकर उसकी चंचलता
तेज धूप में
उसे छाया देते हैं
हवा के तेज थपेड़ों में
अपना साया देते हैं



हर संकट से छुपाते
हर तरह से खयाल रखते है
नई कोंपल को बचाने
हर सुख दुख सहते हैं

वही कोंपल एक दिन
जवान हो जाती है
एक बड़ा पेड़ बन जाती है

अपनी मजबूत शाखाएं
गुरुर से फैलाती है
युवा ताकत के मद में
उन बूढ़े पेड़ों को सताती है

वो चाहती है उन्हें वहां से हटाना
ताकि लहरा सके
अपनी शाखाओं को
आसमान तक

क्योंकि उसे भान नहीं है
दुनिया की बुरी नजरों का
उसे भान नहीं है
पग पग पर फैले खतरों का

बूढ़े वृक्ष उसे बचाते हैं
समझाते हैं
दायरे में रहकर
शालीनता से जीना सिखाते हैं

उसे दिखाते हैं आईना
कि भविष्य में
वो भी एक
बूढा पेड़ बनेगी
तेरे साये में भी
कुछ नई कोंपल उगेगी

तुम्हें संभालना है उन्हें
बड़ा करना है उन्हें
हम आज है
कल रहें ना रहें

मगर तुम रहोगे
क्या सब कुछ
अकेले सहोगे
इसलिए
अपने साये में
नई कोंपलें उगने देना
खिलने देना, महकने देना
फिर देखना
जीवन महक उठेगा
पल पल चमक उठेगा

कुछ कोंपलें
समझ जाती है
अपने बुजुर्गों की बातें

और जीती है
एक शांतिमय मधुर जीवन
अनेकों अन्य
नई कोंपलों के साथ

और वो कोंपल
जो अपनी अकड़ में
यौवन के मद में
नकार देती है नसीहतें
एकाकी रह जाती है
अंत समय पछताती है

हवा के हल्के से झोंके में
जब हिलती है जड़ें
तब ढूंढती है कोई साथी
लेकिन
कोई नहीं होता
क्योंकि
बूढ़े पेड़ सूख कर
बिना सहारे
"टिक" ना पाए
नए उसके उग्र साये में
"रुक" ना पाए ।।

* जल्दी ही मिलते है मित्रों*

बिगड़ी बात बने नहीं



जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*








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